दुनियाभर में कोरोना संक्रमण को डेढ़ साल से ज्यादा का समय बीत गया है। नोवेल कोरोनावायरस की शुरुआत के साथ दुनियाभर के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस गंभीर वायरस से बचाव के उपायों को ढूंढने में लग गए थे। इसे चमत्कार ही कहा जाएगा कि वैज्ञानिकों ने एक साल के भीतर ही कोरोना से मुकाबले के लिए वैक्सीनों को तैयार कर दिया। तमाम अध्ययनों की मानें तो कोरोना संक्रमण से सुरक्षा देने में वैक्सीन ही सबसे प्रभावी हथियार मानी जा सकती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए दुनिया के तमाम देशों ने वैक्सीन के निर्माण का काम शुरू कर दिया।
कोरोना से जंग: जानिए किस तकनीक पर आधारित है आपको दी जा रही वैक्सीन? कैसे करती है काम?
एमआरएनए वैक्सीन
फाइजर-बायोएनटेक और मॉडर्ना की वैक्सीन एमआरएनए वैक्सीन तकनीक पर आधारित है। मैसेंजर आरएनए (एमआरएनए) वैक्सीन घातक रोगजनकों से लड़ने के लिए कोशिकाओं को सक्रिय करके प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर करती है। कोविड-19 के संदर्भ में, एमआरएनए वैक्सीन में वायरस के जेनेटिक कोड के छोटे टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है, जो इंजेक्ट होने के बाद शरीर में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करके शरीर में एंटीबॉडीज की निर्माण करती हैं। इन एंटीबॉडीज को संक्रमण से मुकाबले के लिए काफी कारगर माना जाता है। कई अध्ययनों में एमआरएनए वैक्सीन को कोरोना के विभिन्न वैरिएंट्स के खिलाफ काफी असरदार पाया गया है।
डीएनए-आधारित वैक्सीन
डीएनए-आधारित वैक्सीन को तैयार करने के लिए संशोधित डीएनए का उपयोग किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इस तरह की वैक्सीन वायरस के खिलाफ मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली के निर्माण के साथ रखरखाव और निर्माण के मामले में काफी बेहतर मानी जाती है। भारत को मिलने वाली संभावित तीसरी स्वदेशी वैक्सीन जायकोव-डी, कोरोना की पहली डीएनए-आधारित वैक्सीन है। यह एक 'प्लाज्मिड डीएनए' वैक्सीन है जो प्लास्मिड नामक डीएनए अणुओं के गैर-प्रतिकृति संस्करण का उपयोग करके तैयार की जाती है। कोरोना संक्रमण से सुरक्षा देने में इस वैक्सीन को काफी प्रभावी माना जा रहा है। फिलहाल इसे अभी ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया (डीसीजीआई) से इस्तेमाल की मंजूरी मिलने का इंतजार है।
प्रोटीन सबयूनिट वैक्सीन
इस तरह की वैक्सीन को तैयार करने के लिए वायरस के कुछ हिस्सों का उपयोग किया जाता है जो घातक रोगज़नक़ों से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोटीन सबयूनिट वैक्सीन के कारण साइड इफेक्ट का जोखिम बहुत कम होता है, इसका अर्थ यह भी है कि इसका इम्यून रिस्पांस भी कम हो सकता है। यही कारण है कि इन टीकों से शरीर में मजबूत प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए सहायकों को शामिल करने की आवश्यकता होती है। स्वाभाविक रूप से यह एंटीजन अकेले ही प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं। नोवावैक्स की वैक्सीन प्रोटीन सबयूनिट वैक्सीन तकनीक पर आधारित है।
वायरल वेक्टर वैक्सीन
वायरल वेक्टर वैक्सीन को तैयार करने के लिए वायरस के संशोधित रूप का इस्तेमाल किया जाता है। शरीर में इंजेक्ट होने के साथ यह वैक्सीन प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर करने का काम करती है। कोरोनावायरस के लिए वायरल वेक्टर वैक्सीन बनाने के लिए एडेनोवायरस का उपयोग किया जाता है। एडेनोवायरस, एक प्रकार का सामान्य कोल्ड वायरस होता है जो खुद को कोशिकाओं से जोड़कर कोरोनावायरस के खिलाफ स्पाइक प्रोटीन बनाने का निर्देश देता है। वर्तमान समय में ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका द्वारा विकसित कोविशील्ड वैक्सीन, वायरल वेक्टर तकनीक पर ही आधारित है।
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स्रोत और संदर्भ:
Understanding How COVID-19 Vaccines Work
अस्वीकरण नोट: यह लेख रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) की वेबसाइट से एकत्रित की गई जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। ज्यादा जानकारी के लिए आप अपने चिकित्सक से संपर्क कर सकते हैं।