मेंटल हेल्थ की समस्याएं वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती जा रही हैं। कम उम्र के लोग यहां तक कि बच्चे भी इसका शिकार हो रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हाल के वर्षों में लोगों में जागरूकता काफी बढ़ी है। बच्चों के मेंटल हेल्थ को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ और भी चिंता जताते रहे हैं। बच्चे अपनी समस्याओं को खुलकर बता नहीं पाते, जिससे उनमें बीमारियों के लंबे समय तक निदान न हो पाने की समस्या देखी जाती रही है।
मेंटल हेल्थ: क्या आपका बच्चा भी बात-बात पर झल्लाने लगा है? कहीं ये स्ट्रेस-एंग्जाइटी का संकेत तो नहीं
टीनएजर्स में तनाव और चिंता कई बार सीधे शब्दों में सामने नहीं आती। चिड़चिड़ापन, नींद में बदलाव, पढ़ाई में गिरावट, दोस्तों से दूरी और बार-बार सिरदर्द या पेट दर्द इसके संकेत हो सकते हैं। जब ये बदलाव लगातार बने रहें और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित करें, तो विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।
किशोरों में मेंटल हेल्थ की समस्या
अमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री (एएसीएपी) के अनुसार बच्चों और किशोरों में सामान्य रूप से स्ट्र्रेस-एंग्जाइटी होना स्वाभाविक है। समस्या तब बनती है जब चिंता लंबे समय तक बनी रहे या बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी में बाधा बनने लगे।
- स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, किशोरों में एंग्जाइटी का संकेत लगातार चिंता-बेचैनी, चिड़चिड़ापन, किसी बात को लेकर बार-बार आश्वासन मांगना या ऐसी परिस्थितियों से बचना हो सकता है जिनमें पहले वह सामान्य रूप से शामिल होता था।
माता-पिता देते रहें ध्यान
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं सभी माता-पिता को बच्चों के व्यवहार और दैनिक गतिविधियों पर लगातार ध्यान देते रहना चाहिए। अगर बच्चे के व्यवहार में कुछ समय से बदलाव महसूस कर रहे हैं तो सावधान हो जाइए।
- बच्चे में चिड़चिड़ापन और गुस्सा तो नहीं बढ़ गया है?
- दोस्तों और परिवार से दूरी तो नहीं बनाने लगा है?
- नींद में बदलाव, जैसे सोने में परेशानी या बहुत ज्यादा सोना की आदत
- बार-बार सिरदर्द, पेट दर्द या मितली जैसी शिकायतें
- पढ़ाई या स्कूल से अचानक दूरी तो नहीं बनाने लगा है।
स्ट्रेस और एंग्जाइटी के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, किशोरावस्था में स्कूल और परीक्षा का दबाव, भविष्य को लेकर चिंता, दोस्ती और सामाजिक स्वीकार्यता, परिवार में तनाव, बुलिंग जैसी परिस्थितियां तनाव और चिंता को बढ़ाने वाली हो सकती हैं। हालांकि एंग्जाइटी डिसऑर्डर का कोई एक कारण नहीं होता। सबसे पहले बच्चे को यह महसूस कराना जरूरी है कि उसकी बात सुनी जाएगी और तुरंत डांटा या फैसला नहीं सुनाया जाएगा।
अगर चिंता या तनाव बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तब विशेषज्ञ से सलाह लेने में देर नहीं करनी चाहिए। समय पर डॉक्टरी मदद से समस्या को समझने और उसे ठीक करने में मदद मिल सकती है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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