राजधानी दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण और इसके कारण होने वाली समस्याएं, स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए बड़ी चिंता का कारण बनी हुई हैं। पिछले 4-5 दिनों में हवा के स्तर में सुधार तो हुआ है पर एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) अब भी 'सीवियर' कैटेगरी में बनी हुई है, इस तरह की हवा में सांस लेने से कई प्रकार की गंभीर बीमारियों का खतरा हो सकता है।
Air Pollution: क्या एयर प्यूरीफायर वास्तव में सांस की बीमारियों से बचाने में कारगर हैं? अध्ययन में बड़ा खुलासा
एयर प्यूरीफायर कितने प्रभावी
एयर प्यूरीफायर सांस की बीमारियों को रोकने में कितने प्रभावी हैं, इसको लेकर अध्ययन किया गया, जिसके आधार पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पाया कि हवा को साफ करने वाले ये उपकरण श्वसन विकारों को भी कम करते हैं, इस बात के ठोस प्रमाण नहीं हैं। यानी कि इन उपकरणों के इस्तेमाल के बाद भी आप प्रदूषण के कारण होने वाली सांस की समस्याओं से खुद को सुरक्षित नहीं मान सकते हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान से लगातार इनडोर प्रदूषण को कम करने के उपायों को लेकर विशेष जोर दिया जाता रहा है।
दो प्रकार के होते हैं एयर प्यूरीफायर
यहां ये समझना जरूरी है कि एयर प्यूरीफायर किस तरह से काम करते हैं।
ये उपकरण मुख्यरूप से दो प्रकार के होते हैं- फिल्टर और वायु कीटाणुनाशक। फिल्टर प्यूरीफायर, हवा से उन कणों को हटाने में मदद करते हैं जिनमें संक्रामक वायरस हो सकते हैं। वहीं कीटाणुनाशक प्यूरीफायर पराबैंगनी विकिरण या ओजोन का उपयोग करके हवा में वायरस को निष्क्रिय करने में मदद करते हैं। इन्फ्लूएंजा या नोरोवायरस के साथ किए गए परीक्षण में इन उपकरणों को बहुत प्रभावी नहीं पाया गया है।
अध्ययन में क्या पता चला?
एक अन्य जर्मन अध्ययन में किंडरगार्टन कोरोना वायरस पर हाई एफिशिएंसी पार्टिकुलेट एयर (हेपा) फिल्टर की जांच की गई। शोधकर्ताओं ने फिल्टर इंस्टॉल किए गए स्कूलों के बच्चों में श्वसन बीमारी की दर की तुलना, उन स्कूलों से की जिनमें फिल्टर नहीं लगाए गए थे। अध्ययन में पाया गया कि दोनों में कोई खास अंतर नहीं था। इतना ही नहीं जिन स्कूलों में फिल्टर लगाए गए थे, वहां के बच्चों में संक्रमण दर थोड़ी अधिक भी थी, ये संभवत: वेंटिलेशन की कमी के कारण हो सकती है।
क्या कहते हैं अध्ययनकर्ता?
अब बड़ा सवाल ये है कि यदि प्यूरीफायर के उपयोग से भी बीमारी का खतरा कम नहीं होता है, तो इसका क्या कारण हो सकता है? शोधकर्ता कहते हैं, वायु शुद्ध करने वाली प्रौद्योगिकियां कभी भी रामबाण नहीं बन पाएंगी, जैसा कि दावा किया जाता रहा है।
श्वसन संक्रमण फैलाने वाले वायरस के संचरण का जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि आप संक्रमित व्यक्ति के कितने करीब हैं। दूसरा- भले ही ये उपकरण किसी विशेष इनडोर स्थान के भीतर संक्रमण को रोकने में प्रभावी हो सकते हैं लेकिन लोग नियमित रूप एक से दूसरी जगह आते-जाते रहते हैं, ऐसे में संक्रमण का खतरा लगातार बना रहता है। हमें वायु प्रदूषण से बचाव को लेकर निरंतर व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करते रहने की आवश्यकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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