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फेफड़ों के वायुमार्ग में सूजन आने पर इन प्राकृतिक तरीकों से करें उपचार 

Wed, 12 May 2021 05:16 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: तेजस्वी मेहता Updated Wed, 12 May 2021 05:16 PM IST
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natural treatment for swelling in lung path in hindi
अस्थमा से पीड़ित मरीजों में रिस्क फैक्टर को बढ़ाया है - फोटो : Social Media

डॉ  एच .पी  भाराथी, डिप्टी  चीफ  मेडिकल  अफसर ,

जिंदल नेचरक्योर  इंस्टीट्यूट

डिग्री- बीएनवायएस 

अनुभव- 20 वर्ष से अधिक 

अस्थमा सांस से सम्बंधित एक बहुत पुरानी  बीमारी है। अस्थमा से करीब 300 मिलियन लोग पीड़ित हैं और दुनिया में अस्थमा से पीड़ित कुल मरीजों की संख्या भारत में 10% है। फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मेडिकल रिसर्च के शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले सालों में उच्च यातायात तीव्रताऔर ओजोन के खतरे ने अस्थमा से पीड़ित मरीजों में रिस्क फैक्टर को बढ़ाया है। बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण से भारत में सांस से सम्बंधित  बीमारी की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, खासकर बच्चों में इस तरह की बीमारी बहुत ज्यादा हो रही है। प्राकृतिक दृष्टिकोण अपनाने से अस्थमा से पीड़ित मरीजों को लंबे समय तक स्वास्थ्य लाभ प्रदान किया जा सकता है। अगली स्लाइड्स से जानिए किस तरह बीमारी में प्राकृतिक इलाज करता है काम। 

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वायुमार्ग पतला हो जाता है - फोटो : Pixabay

ब्रोन्कियल अस्थमा और इसके होने का कारण 
फेफड़े के वायुमार्ग में जब सूजन आने लगती है तो ऐसी स्थिति को ब्रोन्कियल अस्थमा कहते हैं। इससे वायुमार्ग पतला हो जाता है और बलगम ज्यादा बनने लगता है, खांसी ज्यादा आने लगती है, और सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। यह बीमारी बहुत पुरानी बीमारी है और इससे रोजमर्रा की जिंदगी बहुत गंभीरता से प्रभावित होती है। अगर इस बीमारी का इलाज ठीक से नहीं किया जाए, तो यह क्रोनिक सूजन की बीमारी पैदा कर सकती है इससे न केवल शरीर दुर्बल हो सकता है बल्कि यह जानलेवा भी हो सकता है। हमारे पर्यावरण में अस्थमा बीमारी को बढ़ाने के कई कारक मौजूद है। यहां तक कि पर्यावरण में मौजूद कण और परागों में जमा धूल और मोटर वाहनों से हानिकारक उत्सर्जन से भी अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है। 

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इसके संभावित साइड इफेक्ट चिंता का कारण बने हुए हैं - फोटो : Social media

स्टेरॉयड से होते हैं नुकसान 
वर्तमान में इस कंडीशन का इलाज करने के लिए स्टेरॉयड इंहेलेशन और एंटी-इंफ्लेमटरी दवाओं का उपयोग किया जाता है। ये दवाएं वायुमार्ग में सूजन और बलगम उत्पादन को कम करने का काम करती हैं, इससे लक्षणों में सुधार होता है और कंडीशन को नियंत्रित किया जाता है। हालांकि दवाओं की कीमत ज्यादा होने से और इसके संभावित साइड इफेक्ट चिंता का कारण बने हुए हैं। दूसरी ओर नेचुरोपैथी आधारित इलाज बहुत ही सुरक्षित और टिकाऊ होता है।

 

 

 

 

 

 

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पहला चरण उन्मूलन चरण होता है - फोटो : सोशल मीडिया

अस्थमा में इस तरह नेचुरोपैथी करती है काम  
नेचुरोपैथी किसी बीमारी का इलाज करने और प्रबंधन करने के लिए एक समग्र (हॉलिस्टिक) उपाय है। नेचुरोपैथी में बीमारी किस कारण से होती है, उस कारण का पता लगा करके उस कारण को ख़त्म किया जाता है और बीमारी की गंभीरता को कम किया जाता है। पहला चरण उन्मूलन चरण होता है जिसमे संचित विषाक्त पदार्थों के शरीर से साफ करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, दूसरा होता है सूथिंग फेज (सुखदायक चरण), इसमें शरीर को फिर से जीवंत करने और आवश्यक पोषण की आपूर्ति पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। जबकि तीसरे और आखिरी चरण - रचनात्मक चरण में शरीर की मेटाबॉलिज्म गतिविधि को रेगुलेट किया जाता है। 

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इलाज की प्रक्रिया में तीन चरण शामिल थे - फोटो : अमर उजाला

अस्थमा पीड़ितों पर हुआ सर्वे
नेचुरोपैथी की प्रभाविकता को बताने के लिए जिंदल नेचरक्योर इंस्टीट्यूट, बैंगलोर द्वारा एक स्टडी 2003 से 2006 के बीच 60 मरीजों (25 से 70 साल के बीच) की गयी। जिसमे अस्थमा से पीड़ित मरीजों का इलाज 21 दिन में किया गया। इस इलाज की प्रक्रिया में तीन चरण शामिल थे। पहला चरण नेचरक्योर थेरेपी, दूसरा डाइट थेरेपी और तीसरा योग थेरेपी है।   

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