डॉ एच .पी भाराथी, डिप्टी चीफ मेडिकल अफसर ,
फेफड़ों के वायुमार्ग में सूजन आने पर इन प्राकृतिक तरीकों से करें उपचार
ब्रोन्कियल अस्थमा और इसके होने का कारण
फेफड़े के वायुमार्ग में जब सूजन आने लगती है तो ऐसी स्थिति को ब्रोन्कियल अस्थमा कहते हैं। इससे वायुमार्ग पतला हो जाता है और बलगम ज्यादा बनने लगता है, खांसी ज्यादा आने लगती है, और सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। यह बीमारी बहुत पुरानी बीमारी है और इससे रोजमर्रा की जिंदगी बहुत गंभीरता से प्रभावित होती है। अगर इस बीमारी का इलाज ठीक से नहीं किया जाए, तो यह क्रोनिक सूजन की बीमारी पैदा कर सकती है इससे न केवल शरीर दुर्बल हो सकता है बल्कि यह जानलेवा भी हो सकता है। हमारे पर्यावरण में अस्थमा बीमारी को बढ़ाने के कई कारक मौजूद है। यहां तक कि पर्यावरण में मौजूद कण और परागों में जमा धूल और मोटर वाहनों से हानिकारक उत्सर्जन से भी अस्थमा का खतरा बढ़ जाता है।
स्टेरॉयड से होते हैं नुकसान
वर्तमान में इस कंडीशन का इलाज करने के लिए स्टेरॉयड इंहेलेशन और एंटी-इंफ्लेमटरी दवाओं का उपयोग किया जाता है। ये दवाएं वायुमार्ग में सूजन और बलगम उत्पादन को कम करने का काम करती हैं, इससे लक्षणों में सुधार होता है और कंडीशन को नियंत्रित किया जाता है। हालांकि दवाओं की कीमत ज्यादा होने से और इसके संभावित साइड इफेक्ट चिंता का कारण बने हुए हैं। दूसरी ओर नेचुरोपैथी आधारित इलाज बहुत ही सुरक्षित और टिकाऊ होता है।
अस्थमा में इस तरह नेचुरोपैथी करती है काम
नेचुरोपैथी किसी बीमारी का इलाज करने और प्रबंधन करने के लिए एक समग्र (हॉलिस्टिक) उपाय है। नेचुरोपैथी में बीमारी किस कारण से होती है, उस कारण का पता लगा करके उस कारण को ख़त्म किया जाता है और बीमारी की गंभीरता को कम किया जाता है। पहला चरण उन्मूलन चरण होता है जिसमे संचित विषाक्त पदार्थों के शरीर से साफ करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, दूसरा होता है सूथिंग फेज (सुखदायक चरण), इसमें शरीर को फिर से जीवंत करने और आवश्यक पोषण की आपूर्ति पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। जबकि तीसरे और आखिरी चरण - रचनात्मक चरण में शरीर की मेटाबॉलिज्म गतिविधि को रेगुलेट किया जाता है।
अस्थमा पीड़ितों पर हुआ सर्वे
नेचुरोपैथी की प्रभाविकता को बताने के लिए जिंदल नेचरक्योर इंस्टीट्यूट, बैंगलोर द्वारा एक स्टडी 2003 से 2006 के बीच 60 मरीजों (25 से 70 साल के बीच) की गयी। जिसमे अस्थमा से पीड़ित मरीजों का इलाज 21 दिन में किया गया। इस इलाज की प्रक्रिया में तीन चरण शामिल थे। पहला चरण नेचरक्योर थेरेपी, दूसरा डाइट थेरेपी और तीसरा योग थेरेपी है।