प्लास्टिक की जब खोज की गई तो संभवत: माना गया था कि ये इंसानों की जिंदगी को आसान बना देगी। लेकिन अब यही प्लास्टिक हमारी सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। हर दिन हम पानी की बोतल, पैकेज्ड फूड, प्लास्टिक बैग जैसी कई प्लास्टिक वाली चीजों का इस्तेमाल करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये सूक्ष्म कणों के रूप में हमारे शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसे माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। प्लास्टिक के ये छोटे कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि नंगी आंखों से दिखते भी नहीं, लेकिन ये हवा, पानी और खाने के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं।
Microplastic: फेफड़े-मस्तिष्क और हड्डियां सब खतरे में, माइक्रोप्लास्टिक बनता जा रहा 'सेहत का दुश्मन'
- रोजाना हमारे शरीर में अनजाने में ही सही, प्लास्टिक का कचरा इकट्ठा होता जा रहा है।
- साल 2022 में किए गए एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पहली बार इंसानों के खून में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए। अब वैज्ञानिकों ने बताया है कि माइक्रोप्लास्टिक, हड्डियों के लिए भी दिक्कतें बढ़ाती जा रही हैं।
हर दिन शरीर में जा रहा है माइक्रोप्लास्टिक
रोजाना हमारे शरीर में अनजाने में ही सही, प्लास्टिक का कचरा इकट्ठा होता जा रहा है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि हर इंसान एक हफ्ते में लगभग 5 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निगल रहा है। ये छोटे-छोटे माइक्रोप्लास्टिक के कण हमारी हवा, पानी, खाने और यहां तक कि नमक में भी मिल चुके हैं।
वैज्ञानिकों ने हाल ही में चेतावनी दी है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल पर्यावरण और जलवायु को ही नहीं, बल्कि हड्डियों को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। खून, दिमाग, प्लेसेंटा और यहां तक कि हड्डियों में भी इन कणों की मौजूदगी साबित हो चुकी है। नए शोध से खुलासा हुआ है कि माइक्रोप्लास्टिक अस्थि कोशिकाओं को कमजोर करते हैं, सूजन बढ़ाते हैं और हड्डियों के विकास को रोक सकते हैं।
माइक्रोप्लास्टिक से हड्डियों को होने वाली समस्याएं
ब्राजील के वैज्ञानिकों ने 62 अध्ययनों की समीक्षा कर पाया कि माइक्रोप्लास्टिक हड्डी की मज्जा में मौजूद स्टेम सेल्स की क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं। यह हड्डियों को तोड़ने वाली कोशिकाओं की संख्या बढ़ा देते हैं, जिससे हड्डी का क्षय तेज होता है।
इंटरनेशनल ऑस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन के अनुसार, साल 2050 तक ऑस्टियोपोरोसिस से जुड़ी हड्डी टूटने की घटनाएं 32 फीसदी तक बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि हड्डियों को मजबूत रखने के लिए आहार और व्यायाम जितने जरूरी हैं, उतना ही महत्वपूर्ण है माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करना है।
अगर इसे समय रहते नियंत्रित किया गया, तो लाखों लोगों को भविष्य में अस्थि रोगों और फ्रैक्चर से बचाया जा सकता है।
फेफड़ों की समस्या और कैंसर का खतरा
इससे पहले के शोधों में भी माइक्रोप्लास्टिक के कारण होने वाले गंभीर जोखिमों को लेकर अलर्ट किया जाता रहा है।
हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कण हमारी सांसों के साथ फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। यह कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि शरीर की प्राकृतिक फिल्टरिंग प्रक्रिया इन्हें रोक नहीं पाती। शोध के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक फेफड़ों में सूजन, एलर्जी और अस्थमा जैसी दिक्कतें पैदा कर सकते हैं। लंबे समय तक इनका असर फेफड़ों की क्षमता को घटा सकता है और सांस लेने में तकलीफ बढ़ा सकता है।
कुछ अध्ययनों ने यह भी संकेत दिया है कि माइक्रोप्लास्टिक कण फेफड़ों में जमा होकर कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं।
बच्चे तक सुरक्षित नहीं
माइक्रोप्लास्टिक सिर्फ फेफड़ों के लिए खतरा नहीं बढ़ा रहा, इससे बच्चों की सेहत पर भी गंभीर असर हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल शिशु की सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। इससे न सिर्फ शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है, बल्कि इससे क्रॉनिक बीमारियों का भी खतरा हो सकता है।
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स्रोत
Scientists find microplastics in human bones that are weakening our skeletons
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