जब भी कोई मेडिकल इमर्जेंसी होती है तो एक मशीन गंभीर रूप से बीमार लोगों की जिंदगी बचा लेती है। किसी जमाने में ऐसी ही एक महामारी के वक्त ये मशीन बनाई गई थी। दुनिया में इंटेसिव केयर यूनिट्स और मैकेनिकल वेंटिलेशन मशीनों की शुरुआत ऐसे ही हुई थी। आज दुनिया भर के अस्पताल इसका इस्तेमाल करते हैं और कोरोना वायरस से फैली कोविड-19 की महामारी के इलाज में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
ICU: 68 साल पहले वजूद में नहीं थी आईसीयू, इस महामारी के बाद दुनिया में हुई शुरुआत
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68 साल पहले
डेनमार्क के कोपेनहेगन में 500 बिस्तरों वाले ब्लेगडैम हॉस्पिटल में डॉक्टर और नर्स मरीजों की बाढ़ से इस कदर लाचार हो गए थे कि वे उनकी मदद नहीं कर पा रहे थे। इन मरीजों में ज्यादातर बच्चे थे। उस जमाने में पोलियो एक गंभीर वायरल इंफेक्शन (विषाणु से होने वाला संक्रमण) था जिसका कोई इलाज नहीं था।
कई लोग तो बिना किसी लक्षण के ही इस वायरस से संक्रमित हो रहे थे। कुछ मामलों में ये वायरस रीढ़ में मौजूद नर्व्स (तंत्रिकाओं) और मस्तिष्क की तली पर हमला कर रहा था। इससे मरीज को लकवा मारने का खतरा था, खासकर पैरों में। ब्रिटेन की हेल्थ सर्विस के मुताबिक श्वसन प्रणाली की मांसपेशियों पर लकवे के आघात की स्थिति में ये बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है। पिछली सदी के मध्य में कोपनहेगन पोलियो की महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से था।
पोलियो की महामारी
साइंस जर्नल 'नेचर' में छपे एक लेख के मुताबिक, "ब्लेगडैम हॉस्पिटल में हर रोज पोलियो से संक्रमित 50 लोग आ रहे थे। उनमें छह से 12 लोगों को रोज श्वसन तंत्र की नाकामी की समस्या का सामना करना पड़ रहा था।"
"महामारी के पहले हफ्ते में ज्यादातर जो मरीज आ रहे थे, उनमें 87 फीसदी पोलियो संक्रमण की उस अवस्था में थे जब ये वायरस संक्रमित व्यक्ति के दिमाग पर हमला कर रहा था या फिर उस नर्व (तंत्रिका) पर जिससे शरीर सांसों पर नियंत्रण रखता है। इन मरीजों में आधे से ज्यादा बच्चे थे।"
लेकिन एक डॉक्टर ने इस समस्या का हल निकाल दिया और आधुनिक मेडिकल साइंस के इंतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय लिख दिया। डैनिश डॉक्टर बजॉर्न आजे इब्सेन वैसे तो पेशे से अनीस्थीसिया विशेषज्ञ थे और उन्होंने अपने करियर का लंबा समय अमरीका के बोस्टन में गुजारा था। अपने देश के स्वास्थ्य संकट को देखते हुए इसका हल निकाला और हजारों लोगों की जिंदगियां बचा लीं।
आईसीयू इतना महत्वपूर्ण क्यों होता है?
स्विटजरलैंड के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की देखरेख कर रहे डॉक्टर फिलिप जेंट बताते हैं, "जिन मरीजों के महत्वपूर्ण अंग काम करना बंद कर देते हैं और उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली के सपोर्ट की जरूरत होती है। ये इसलिए जरूरी हैं क्योंकि मरीज की जान को खतरा होता है।"
"आईसीयू में मरीज की स्थिति पर करीबी नजर रखी जा सकती है और इलाज को जरूरत के मुताबिक बदला जा सकता है। मरीज का खास ख्याल केवल आईसीयू में ही रखा जा सकता है। अस्पताल के इस हिस्से में प्रति मरीज डॉक्टरों और नर्सों का अनुपात सबसे ज्यादा होता है। आईसीयू में भर्ती मरीजों को देखने वाले डॉक्टर उच्च योग्यता रखने वाले होते हैं।"
शायद इसीलिए आईसीयू को इंटेसिव मेडिसिन भी कहा जाता है। इंटेसिव केयर यूनिट्स की अहमियत सिर्फ इसलिए नहीं है कि यहां मरीजों का खास ख्याल रखा जाता है और हाई स्टैंडर्ड का हाइजीन मेनटेन किया जाता है। किडनी, दिल और श्वसन तंत्र के नाकाम होने की सूरत में इन मशीनों की उपलब्धता बेहद अहम हो जाती है।
डॉक्टर फिलिप जेंट कहते हैं, "अक्सर लोगों को सांस लेने में तकलीफ का सामना करना पड़ता है। ये समस्या फेफड़े से जुड़ी होती है। इसलिए आईसीयू में भर्ती मरीज को रेस्पिरेटर्स की मदद से कृत्रिम रूप से सांस दी जाती है।"