Air Pollution: दुनियाभर में बढ़ता वायु प्रदूषण सेहत को गंभीर रूप से क्षति पहुंचाता दिख रहा है। जिस हवा में हम रोजाना सांस लेते हैं, उसमें कई प्रकार के हानिकारक गैस, रसायनों का स्तर बढ़ गया है। कई मेडिकल रिपोर्ट्स से साफ होता है कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोगों में तमाम तरह की क्रॉनिक बीमारियों का जोखिम अधिक हो सकता है।
Alert: आंखों की रोशनी संकट में, प्रदूषण के कारण बच्चों में बढ़ रही है 'अंधा बनाने वाली ये बीमारी'
- आज दुनिया में लगभग एक तिहाई बच्चे और किशोर मायोपिया से पीड़ित हैं। इस समस्या में बच्चे दूर की चीजें साफ नहीं देख पाते और उम्र बढ़ने के साथ यह और गंभीर होती जाती है। प्रदूषित हवा बच्चों की आंखों के कॉर्निया और आंख के आकार को प्रभावित करती है।
वायु प्रदूषण का आंखों पर असर
विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों में एलर्जी से जुड़ी आंखों की बीमारियां जैसे एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस बढ़ते प्रदूषण की बड़ी देन है। वायु प्रदूषण आंखों की प्राकृतिक सुरक्षा को कमजोर कर देता है, इससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।
साफ हवा केवल फेफड़ों के लिए नहीं बल्कि बच्चों की आंखों की रोशनी बचाने के लिए भी जरूरी है। अध्ययन में खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण बच्चों में निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) का बड़ा कारण बन रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण न सिर्फ आंखों में सूजन और तनाव पैदा करता है, बल्कि सूरज की रोशनी के संपर्क को भी कम करता है, जिससे आंख का आकार बदल सकता है और मायोपिया तेजी से बढ़ सकता है।
मायोपिया की बढ़ रही है समस्या
अध्ययन के अनुसार आज दुनिया में लगभग एक तिहाई बच्चे और किशोर मायोपिया से पीड़ित हैं। इस समस्या में बच्चे दूर की चीजें साफ नहीं देख पाते और उम्र बढ़ने के साथ यह और गंभीर होती जाती है। मायोपिया की गंभीर स्थिति आंखों की रोशनी भी छीन सकती है।
शोधकर्ताओं ने पाया है कि दूषित हवा बच्चों की आंखों के कॉर्निया और आंख के आकार को प्रभावित करती है। जब रोशनी आंख में प्रवेश करती है तो वह रेटिना पर ठीक से केंद्रित नहीं हो पाती, जिसके चलते छवि धुंधली दिखाई देने लगती है।
भारत में भी बच्चों में मायोपिया की समस्या तेजी से बढ़ रही है। एम्स और एलवी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, शहरी इलाकों में 10 से15 साल के बच्चों में मायोपिया के मामले पिछले एक दशक में दोगुने हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण के साथ मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल भी इस समस्या को बढ़ा रहा है।
हानिकारक रसायन डालते हैं सीधा असर
पीएनएएस नेक्सस जर्नल में प्रकाशित तियानजिन मेडिकल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम सहित कई संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययन से यह भी पता चला कि वायु प्रदूषण के प्रमुख तत्व नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) और महीन कण (पीएम2.5) बच्चों की दृष्टि पर सीधा असर डालते हैं।
ऐसे बच्चे जो साफ हवा वाले क्षेत्रों में रहते हैं, उनकी आंखें बिना चश्मे के भी ज्यादा स्वस्थ पाई गईं। अध्ययन में खासतौर पर छोटे बच्चों पर प्रदूषण के अधिक प्रभाव देखे गए। प्राथमिक स्कूल स्तर के बच्चों की दृष्टि सबसे ज्यादा संवेदनशील पाई गई, जबकि बड़े बच्चों में आनुवंशिकी कारक ज्यादा असर डालते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि समय रहते कदम उठाए जाएं तो इस समस्या की गंभीरता को रोका जा सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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