भारत में कोविड-19 संक्रमण के कुल मामले अब करीब 16 लाख हो गए हैं। जिनमें से 5 लाख 30 हजर के करीब सक्रिय मामले हैं और 10 लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं, वहीं मरने वालों की संख्या करीब 35 हजर हो गई है। इन आंकड़ों के साथ भारत का रिकवरी रेट करीब 64 प्रतिशत हो गया, यानी अभी तक जितने लोग संक्रमित हुए हैं, उनमें से 64 प्रतिशत लोग ठीक हो गए हैं, लेकिन अगर केवल दिल्ली की बात करें तो ये आंकड़ा 90 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है। कोरोना से ठीक होने वाले लोगों की संख्या के 10 लाख तक पहुंचने को सरकार एक उपलब्धि की तरह पेश कर रही है।
कोरोना वायरस: किन चिकित्सा प्रयासों के जरिए बढ़ा रिकवरी रेट? यह कितनी बड़ी उपलब्धि?
सोमवार को स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक ट्वीट कर लिखा, “हमने 10 लाख लोगों के ठीक होने के आंकड़े को छू लिया है। ये मौका है जब हमें अपने डॉक्टर, नर्स और फ्रंटलाइन वर्कर्स का अभिनंदन करना चाहिए। ये उनकी कर्तव्य निष्ठा और बलिदान का नतीजा है जो इतनी बड़ी संख्या में लोग रिकवर हुए हैं।”
लोगों के रिकवर होने में निश्चित रुप से डॉक्टरों और फ्रंटलाइन वर्कर्स ने अहम भूमिका निभाई है लेकिन क्या इससे यह साबित होता है कि सरकार कोविड से लड़ने में कामयाब साबित हो रही है? स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, भारत में पिछले 24 घंटों में संक्रमण के 50 हजर से ज्यादा मामले सामने आए हैं। पिछले 24 घंटे में संक्रमण के 52,123 नए मामले दर्ज किए गए हैं और 775 लोगों की मौत हुई है।
रिकवरी रेट क्यों बढ़ रहा है?
आइसीएमआर के पूर्व अध्यक्ष एन के गांगुली ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि रिकवरी रेट के बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “ये बात जरुर है कि इंफ्रास्ट्रचर में काफी इजफा हुआ है, कम समय में कई अस्पताल तैयार कर लिए गए, पीपीई किट और वेंटिलेटर उपलब्ध हो गए, जिन राज्यों में ऐसा हुआ वहां उन लोगों की रिकवरी बढ़ी जो अस्पताल में भर्ती हुए, उन राज्यों में जहां बहुत अच्छी तैयारियां नहीं थी, वो जूझते हुए दिखाई दिए, जैसे दिल्ली और मुंबई में मरने वालों का प्रतिशत कम रहा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल थोड़ा पीछे रहे।”
गांगुली के मुताबिक भारत में बीमारी का प्रभाव भी अमेरिका और यूरोप जैसा नहीं था। इसका एक कारण ये हो सकता है कि हमारे देशों में सार्स के वायरस पहले भी आ चुके हैं। कई कंटेनमेंट जोन में सरकार की पॉलिसी ने भी मदद की। देश के पूर्व डॉयरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज डॉक्टर जगदीश प्रसाद के मुताबिक “पहले हम प्लाज्मा थेरेपी, एंटी वायरल ड्रग जैसी चीजें इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, हर चीज का एक लर्निंग कर्व होता है, समय के साथ आप सीखते हैं, इस मामले में भी हमनें सीखा है जिसका ये असर हो सकता है।”
जगदीश प्रसाद बताते हैं, “इस बीमारी में यह देखा गया है कि बुजुर्गों पर इसका असर ज्यादा और युवाओं पर कम होता है। भारत में युवा ज्यादा हैं, यहां 80 साल से अधिक उम्र के लोग कम है, पश्चिम देशों में ज्यादा हैं, इसलिए वहां ज्यादा जानें गई हैं, हमारे यहां ज्यादा लोग ठीक हो गए।”