कोरोना वायरस (Coronavirus) का संक्रमण आए दिन बढ़ता ही जा रहा है। दुनियाभर के 200 से ज्यादा देशों में कोरोना अपना पांव पसार चुका है। इसके लक्षणों से लेकर इसकी दवा और वैक्सीन के लिए विभिन्न देशों में वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। हर दिन इस वायरस को लेकर नए-नए शोध सामने आ रहे हैं। कई शोध के परिणाम चौंकाने वाले होते हैं। हाल ही में ऐसे ही एक शोध अध्ययन की रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें शोधकर्ताओं को कोरोना वायरस का खतरा बढ़ाने वाले जीन के बारे में पता चला है। इस जीन का संबंध मस्तिष्क से जुड़ी बीमारी डिमेंशिया से है। आइए जानते हैं इस बारे में विस्तार से:
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ब्रिटेन में पांच लाख लोगों पर हुई स्टडी में खुलासा, इस जीन से है कोरोना वायरस का अधिक खतरा
Thu, 28 May 2020 02:24 PM IST
निलेश कुमार
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: निलेश कुमार
Updated Thu, 28 May 2020 02:24 PM IST
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डिमेंशिया से भी है कोरोना का संबंध
- फोटो : Pixabay
Research
पांच लाख लोगों के डाटा का विश्लेषण
- ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर यह स्टडी हुई है, जिसमें पांच लाख लोगों के डाटा पर अध्ययन किया गया है। इस रिसर्च स्टडी में बताया गया है कि डिमेंशिया (Dementia) का खतरा बनने वाले जीन के कारण कोरोना वायरस (COVID-19) होने का खतरा और ज्यादा बढ़ सकता है।
डिमेंशिया मस्तिष्क से जुड़ी बीमारी है
- फोटो : Pixabay
डिमेंशिया है क्या?
- मालूम हो कि डिमेंशिया मस्तिष्क से जुड़ी ऐसी बीमारी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता खत्म होने लगती है और उसकी याददाश्त भी धीरे-धीरे चली जाती है। इस बीमारी से पीड़ित मरीजों को कोई भी निर्णय लेने में परेशानी होती है। पहले हुए कई शोध अध्ययन में कोरोना पीड़ित मरीजों में मानसिक विक्षिप्तता के शुरुआती लक्षण भी देखे जा चुके हैं।
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कोरोना वायरस
ई4ई4 जीन है कारण
- जर्नल ऑफ जेरोंटोलॉजी में प्रकाशित इस स्टडी के मुताबिक वायरस ऐसे लोगों में ज्यादा पाया गया है, जिनमें डिमेंशिया से जुड़ा यह जीन मौजूद होता है। इस स्टडी के मुताबिक, ऐसे लोगों को कोरोना संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है, जो गड़बड़ एपीओई या ई4ई4 (e4e4 gene) नामक जीन के वाहक होते हैं।
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सांकेतिक तस्वीर
हर 36वें कोरोना संक्रमित में यही जीन
- ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं के मुताबिक, अनुसार, ब्रिटेन के करीब पांच लाख लोगों पर यह अध्ययन किया गया है और उसी आधार पर डाटा विश्लेषण हुआ है। इस विश्लेषण में शोधकर्ताटों ने पाया कि कोरोनावायरस से संक्रमित हर 36वें व्यक्ति में यह जीन मौजूद है।