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ऑटोप्सी: चिकित्सा जगत की एक लुप्त होती 'प्रथा', जिसने कोरोना वायरस के रहस्यों को उजागर किया

Thu, 24 Dec 2020 10:20 PM IST
सोनू शर्मा सोनू शर्मा, नई दिल्ली
सोनू शर्मा, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Thu, 24 Dec 2020 10:20 PM IST
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Coronavirus fading practice of autopsy revealed secrets of Covid 19
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

कोरोना महामारी ने ऑटोप्सी यानी शव परीक्षण को पुनर्जीवित करने में मदद की है। जब यह वायरस पहली बार अमेरिकी अस्पतालों में आया था, तो डॉक्टर इसके लक्षणों के बारे में केवल अनुमान लगा सकते थे कि क्यों मरीज सूंघने और स्वाद की क्षमता खो रहे थे, त्वचा पर चकत्ते हो रहे थे, सांस लेने में दिक्कत हो रही थी और फ्लू के लक्षण, जैसे- खांसी और सर्दी हो रही थी? आखिरकार उन्हें इसका जवाब मिल ही गया और ये शव परीक्षण के माध्यम से संभव हो पाया। मृत रोगियों के प्रारंभिक शव परीक्षण ने पुष्टि की कि कोरोना वायरस न केवल श्वसन रोग का कारण बनता है, बल्कि यह अन्य महत्वपूर्ण अंगों पर भी हमला कर सकता है। 

Coronavirus fading practice of autopsy revealed secrets of Covid 19
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

न्यूयॉर्क में नॉर्थवेल हेल्थ में पैथोलॉजिस्ट (रोगविज्ञानी) डॉ. एलेक्स विलियमसन कहते हैं, 'आप उस चीज का इलाज नहीं कर सकते जिसके बारे में आप नहीं जानते हैं। ऑटोप्सी यानी शव परीक्षण से किसी की मौत को करीब से देखकर कई लोगों की जान बचाई गई है।'   

Coronavirus fading practice of autopsy revealed secrets of Covid 19
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

शव परीक्षणों ने सदियों से दवा की जानकारी दी है, जैसे- कैंसर रोगियों की देखभाल में सुधार कैसे किया जाए, एड्स और एंथ्रेक्स को कैसे नष्ट किया जाए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऑटोप्सी का महत्व काफी घट गया है, क्योंकि चिकित्सा जगत ने प्रयोगशाला परीक्षणों की ओर रुख कर लिया है। साल 1950 में अस्पताल के करीब 50 फीसदी मृत रोगियों की ऑटोप्सी की जाती थी, लेकिन आज ये दरें पांच से 11 फीसदी के बीच कहीं सिकुड़ कर रह गई हैं। लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के पैथोलॉजिस्ट डॉ. रिचर्ड वेंडर हीड कहते हैं, 'यह (ऑटोप्सी) वास्तव में एक खोया हुआ उपकरण है।' 

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Coronavirus fading practice of autopsy revealed secrets of Covid 19
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

चूंकि कोरोना वायरस एक खतरनाक और जानलेवा वायरस है, जो तेजी से दुनियाभर में फैल रहा है, ऐसे में संक्रमित मरीजों के शवों का परीक्षण करना कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि उन शवों से परीक्षण करने वाले डॉक्टरों के भी संक्रमित होने का खतरा रहता है और कई अस्पतालों में तो उचित व्यवस्थाएं भी नहीं हैं। सिएटल स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन में पैथोलॉजिस्ट डॉ. डिजिरी मार्शल कहते हैं कि वो अपने सामान्य सूट में तो कोविड मरीजों का शव परीक्षण नहीं कर सकते हैं और अस्पताल में इस प्रक्रिया को सुरक्षित रूप से संचालित करने के लिए उचित वेंटिलेशन का भी अभाव है। 

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Coronavirus fading practice of autopsy revealed secrets of Covid 19
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

हालांकि अन्य कई अस्पतालों ने कठिन परिस्थितियों में भी अधिक से अधिक ऑटोप्सी का प्रदर्शन किया और महामारी को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। न्यू ऑरलियन्स यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में, जहां डॉ. वेंडर हीड भी काम करते हैं, पैथोलॉजिस्ट्स ने हाल के वर्षों में बाकियों की तुलना में लगभग 50 फीसदी अधिक शवों का परीक्षण किया है। अलबामा, कैलिफोर्निया, टेनेसी, न्यूयॉर्क और वर्जीनिया के अन्य अस्पतालों का कहना है कि वे शव परीक्षणों की इस प्रक्रिया में अपने सामान्य वार्षिक टैली (गणना) से भी आगे निकल जाएंगे। उनके परिणामों ने ही हमारी समझ को आकार दिया है कि कोविड-19 शरीर पर क्या प्रभाव डालता है और हम इसका मुकाबला कैसे कर सकते हैं।

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