भारत सरकार की तरफ से हर साल ही पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा की जाती है। इनमें कई नाम ऐसे होते हैं जिन्हें तो पूरी दुनिया जानती है, लेकिन कई नाम ऐसे भी होते हैं जिन्हें ये पुरस्कार मिलने के बाद लोग उन्हें सिर्फ जानते ही नहीं हैं, बल्कि उनके काम को भी पहचानते हैं। इसी कड़ी में इस साल 102 हस्तियों को ये पुरस्कार दिया गया, जिनमें से एक नाम है अली मानिकफान का। इन्होंने बिना पढे-लिखे ही सफलता का वो पचम लहराया, जिसे आज पूरी दुनिया सलाम कर रही है। तो चलिए आपको अली मानिकफान के बारे में कुछ ऐसी बातें बताते हैं, जिनके जरिए आप इन्हें और इनके द्वारा किए गए कामों को जान पाएंगे।
कुछ ऐसी है पद्मश्री अली मानिकफान की कहानी, 7वीं तक पढ़ें हैं लेकिन 14 भाषाओं का है ज्ञान
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दरअसल, 82 साल के अली मानिकफान कहने को स्कूल तो सिर्फ 7वीं कक्षा तक ही पढ़े हैं, लेकिन उन्हें 14 भाषाएं आती हैं। यही नहीं, अली ने मरीन रिसर्च से लेकर एग्रीकल्चर सेक्टर तक में काम किया है। मौजूदा समय में अली केरल के ओलावना शहर में एक किराए के घर में रहते हैं। वहीं, उनकी जिंदगी का ज्यादातर समय लक्षद्वीप के मिनिकॉय आइलैंड पर बीता है। अली के पिता के केरल के कन्नूर में कई जानने वाले लोग रहते थे, इसलिए जब अली 9 साल के थे, तब उनके परिवारवालों ने उन्हें पढ़ाई करने के लिए कन्नूर भेज दिया था।
कन्नूर में अली ने सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की और इसके बाद वो वापस आइलैंड लौट आए। इसके बाद वो साल 1956 में कोलकाता चले गए, जहां उन्हें अलग-अलग विषयों की किताबें मिली। अली के अंदर बचपन से कुछ कर गुजरने की इच्छा थी। इसलिए जब वो आइलैंड लौटे, तो इन किताबों के बारे में जानने के लिए वो इन्हें भी अपने साथ ले गए। अली ने इन्हीं किताबों की मदद से कई भाषाएं सीखी। इनमें मलयालय, अंग्रेजी, फ्रेंच, हिंदी, जर्मन, लैटिन, सिंहली, रशियन, ऊर्दू, संस्कृत और पर्शियन जैसी भाषाएं शामिल हैं। इसके अलावा अली उन लोगों के साथ भी बैठा करते थे, जिन्हें ये भाषाएं आती थी। अली सभी भाषाएं बोल तो नहीं पाते, लेकिन उन्हें लिखना-पढ़ना आता है।
हालांकि, वो अंग्रेजी, उर्दू, हिंदी, तमिल, तेलुगु और मलयालम बोल लेते हैं क्योंकि इन भाषाओं में बात करने वाले लोग हैं। लेकिन बाकी भाषाओं में बात करने वाले लोग उनके आसपास नहीं हैं। अली के अंदर मछलियों के बारे में जानने की भी उत्सुकता जागी। इसलिए उन्होंने आइलैंड पर मौजूद लगभग हर प्रजाति की मछली के बारे में जाना, और उन पर खोजबीन की। इसी की बदौलत साल 1960 में अली को 'सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट' में लैब अटेंडेंट के पद पर काम मिला। यहां उन्होंने काफी रिसर्च करते हुए एक दुर्लभ मछली तक की खोज की, और इस मछली का नाम अली के नाम पर यानी अबुदफुद मानिकफानी रखा गया। इसके बाद इस नौकरी से अली ने साल 1980 में रिटायरमेंट यानी सेवानिवृत्ति ले लिया।
इसके बाद साल 1981 में अली को ओमान एक जहाज बनाने के लिए बुलाया गया। वहां उन्होंने टिम सिरवेन के साथ मिलकर लकड़ी औक कॉयर की मदद से 27 मीटर लंबा जहाज बनाया। ये काम उन्होंने कैसे सीखा, इस पर अली बताते हैं कि, बचपन में एक गाड़ी बिक रही थी, वो सुधर नहीं सकती थी। इसलिए उन्होंने उस गाड़ी को खरीदा और फिर खोलकर दोबारा बना दिया। इस गाड़ी से वो कई साल तक आइलैंड पर घूमे। जो जहाज अली ने बनाया, वो आज भी ओमान के म्यूजियम में सुरक्षित रखा है। इसके बाद अली ने तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में 15 एकड़ की बंजर जमीन को स्वदेशी तरीकों से हरा-भरा कर दिया। साथ ही यहां उन्होंने ट्रेडिशनल सामान से एक घर भी बनाया।