उत्तर प्रदेश के गाजीपुर शहर के महुआबाग स्थित कान्हा हवेली बृहस्पतिवार की शाम काव्य संध्या के भव्य आयोजन की गवाह बनी। अमर उजाला काव्य कैफे की महफिल में वसंत की सुगंध बिखेरती निशा में कवियों ने अपनी रचनाओं से कभी गुदगुदाया तो कभी एहसासों को जगाया तो कभी देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कर दिया। कवियों ने समाज की वैमनस्यता तथा दंगों के दुष्परिणाम बताते हुए व्यंग्य बाण छोड़े। इस दौरान देर रात तक श्रोता काव्य की सरिता में गोते लगाते रहे।
कभी गुदगुदाया तो कभी एहसासों को जगाया, गाजीपुर में सजी अमर उजाला काव्य कैफे की महफिल
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शादी के बाद बीवी गर साथ न रहे...
कान्हा हवेली में गजेंद्र प्रियांशु के माइक संभालते ही ठहाके लगने लगे। उन्होंने अपनी हास्य और चुटीली रचनाओं के जरिये लोगों को खूब हंसाया। शहर के महुआबाग स्थित कान्हा हवेली में पहले सरस्वती वंदना के लिए डा. भुवन मोहिनी को आमंत्रित किया गया। इसके बाद अमर उजाला काव्य कैफे का संचालन कर रहे साहित्य चेतना समाज के अमरनाथ तिवारी अमर ने गजेंद्र प्रियांशु को आमंत्रित किया। प्रथम कवि के रूप में हास्य व्यंग्य के सिरमौर शंभू शिखर माइक जैसे ही मंच पर आए सभागार तालियों से गूंज उठा। एक के बाद एक चुटकुले एवं हास्य व्यंग्य के मुक्तक एवं कविताएं सुनाकर उन्होंने न सिर्फ तालियां बटोरीं, बल्कि उपस्थित श्रोताओं को हंसी का फव्वारा छोड़ने पर विवश कर दिया। वह जब तक मंच पर रहे, हंसी के फव्वारे छूटते रहे।
योगीजी के गंजेपन एवं कुंवारेपन तथा एंटी रोमियो कानून पर कटाक्ष करते हुए सुनाया कि ...जुल्फों में उंगलियों को फिराने नहीं देते, कलियों के पास भंवरों को जाने नहीं देते, इतनी सी शिकायत है योगी जी आपसे, खुद से न पटी हम को पटाने नहीं देते। छप्पन इंच के सीने पर कटाक्ष किया कि ...चेहरे पर एक रुआब नया चढ़ ही जाता है, इतिहास में मुकाम नया गढ़ ही जाता है, शादी के बाद बीवी गर साथ न रहे, सीने का नाप इंच-इंच बढ़ ही जाता है। एक चुनावी घोषणा पर उनके व्यंग्य ...तुम तोड़ो वादा और हम निभाते रहेंगे, नाराजगी हम ऐसे ही जताते रहेंगे, जब तक 15 लाख न आते खाते में, तब तक हम तुमको जिताते रहेंगे, को श्रोताओं ने खूब पसंद किया। कोरोना काल में क्वारंटीन किए जाने के बाद की स्थिति पर सुनाया कि ...मौका मिला तो दो से भला तीन हो गई। जाने वह किसके साथ क्वारंटीन हो गई।
बिजलियां भी गिरकर शर्मसार होती हैं...
गाजीपुर। काव्य कैफे का संचालन कर रहे प्रियांशु गजेंद्र ने कवि शंभू शिखर के बाद डा. भुवन मोहिनी को आमंत्रित किया। अपनी हाजिर जवाबी के लिए प्रसिद्ध इस कवयित्री ने अपनी रचनाओं से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। उन्होंने चुटीले हास्य-व्यंग्य के मुक्तक के साथ आगाज किया। ‘समझ नहीं आता है हमको राजनीति का फंडा, एक रात में दिलवा दे मुर्गे से भी अंडा। हम नीलांबर घर को ठिकाना नहीं बनाते, साफ कहते हैं बहाना नहीं बनाते, बिजलियां भी गिरकर शर्मसार होती हैं, हम ऐसे खंडहरों को निशाना नहीं बनाते।’ जैसी रचनाओं का जादू श्रोताओं पर खूब चला। इसके बाद उन्होंने ‘सकल कल्याण की घर में तलहटी नहीं होती, सर्व शुभ-लाभ की सूचक श्री ऐसी नहीं होती, हर एक बेटी के अपने भाग्य में होता पिता लेकिन यहां हर एक पिता के भाग्य में बेटी नहीं होती’ पेश किया।
इसके अलावा बेटी बचाओ नारे को सार्थक बनाने के लिए बेटियों को भी आगाह करते हुए कहा कि ‘वह अपने संस्कार न भूलें। तना हो सिर पर जब छप्पर तो सावन क्या बिगाड़ेगा, दुपट्टा हो बदन पर तो दु:शासन क्या बिगाड़ेगा, तुम्हें सौगंध मर्यादा की जो लक्ष्मण ने खींची थी वह रेखा पार मत करना तो रावण क्या बिगाड़ेगा’ सुनाया। इन पंक्तियों ने कान्हा हवेली में मौजूद श्रोताओं को सोचने पर विवश कर दिया। इसके बाद उन्होंने रुमानियत की तरफ रुख करते हुए कहा ‘दिल रहेगा तुम्हारा तुम्हारी कसम, अब न होगा हमारा तुम्हारी कसम, मैंने हक में तुम्हारे लिए दुआ मांग ली, टूटा जब भी सितारा तुम्हारी कसम। फाल्गुनी बयार हो, बसंत का मौसम हो और शृंगार की बात न हो तो यह बेमानी होगी।’ इसके अलावा ‘नैनों ने नैनों में ही मदिरा घोली रात भर, चांद को पाने की जिद में खिड़की खोली रात भर, प्रणय सेज पर मैंने उसका आमंत्रण स्वीकार किया, मैं भी चुप वह भी चुप दोनों ही चुप चूड़ी बोली रात भर, मैं भी बहका वह भी बहकी मन भी बहका रात भर, सिल्वट-सिल्वट एहसासों पर यौवन दहका रात भर।’ इन रचनाओं पर सभी झूम उठे।