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भानगढ़ की तरह रहस्यमय है यह किला, जहां लटकी मिली थी युवक की लाश

Sat, 25 Nov 2017 02:30 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Sat, 25 Nov 2017 02:30 PM IST
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nahargarh fort- the stories behind change in the name of this fort where a man committed suicide
नाहरगढ़ किला सुसाइड प्रकरण - फोटो : Amar Ujala
भूतों के भानगढ़ के बारे में कई स्टोरी हैं। वहां रात को कोई रुक नहीं सकता। कुछ ऐसा ही 'साया' जयपुर के नाहरगढ़ किले पर भी है। यहां भी कई बार अजीबो-गरीब घटनाएं होती रहती हैं।  283 साल पुराने नाहरगढ़ के ऐतिहासिक किले की प्राचीर पर लटकती लाश ने पिंकसिटी जयपुर में सनसनी फैल गई। जहां यह लाश मिली थी वहां चट्टानों पर कोयले से लिखा था कि 'पद्मावती का विरोध, हम सिर्फ पुतले नहीं लटकाते, हम जान देते हैं।' जिसे अब पद्मावती फिल्म के विरोध से जोड़कर देखा जा रहा है। 

क्राइम सीन में उलझी पुलिस

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Display Image - फोटो : Amar Ujala
मृतक की पहचान चेतन सैनी के रूप में हुई है। घटनास्थल के क्राइम सीन ने पुलिस का उलझा दिया है। यहां चट्टानों पर लिखे गए संदेशों से साफ है कि इस घटना के माध्यम से पद्मावती फिल्म का विरोध करने के साथ-साथ साम्प्रदायिकता भड़काने का प्रयास बताया जा रहा है। हालांकि पुलिस इसे अभी आत्महत्या मान रही है जबकि परिजन का आरोप है कि चेतन की हत्या की गई है।  

तांत्रिकों से रहा है किले का गहरा नाता

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किले के चारों तरफ सुरक्षा के लिये अभेद मोटी दीवारें - फोटो : Amar Ujala
यहां लिखे संदेशों में चेतन का तांत्रिक बताने का प्रयास किया है जबकि परिजनों के अनुसार उसका तंत्र—मंत्र से कोई लेना देना नहीं था। उधर, नाहरगढ़ किले से तांत्रिकों का गहरा नाता रहा है। इस किले के निर्माण में तांत्रिकों का बहुत योगदान रहा है। 
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किले का निर्माण शुरू होते ही होने लगी थी रहस्यमय घटनाएं

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खिड़की के रास्ते आ जाते है बादल - फोटो : File
दरअसल, जब किले का निर्माण चल रहा था तो यहां अजीबो-गरीब घटनाएं हो रही थीं। तत्कालीन जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने इस संबंध तांत्रिकों की सलाह ली और फिर उस अमल किया। जिसके बाद इस किले का निर्माण हो सका। इस किले का नाम इंद्र के पुत्र सुदर्शन के नाम पर सुदर्शन किला रखा गया था, लेकिन बाद में नाहर​गढ़ किया गया। विदेशों में इसे टाइगर फोर्ट के नाम से जानते है जबकि इसके नामकरण से 'टाइगर' का कोई लेना देना नहीं है। यहां तक कि टाइगर भी इस इलाके काफी साल पहले ही खत्म हो गए थेंं।
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दिन का निर्माण कार्य सूर्यास्त के बाद हो जाता था नष्ट

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नाहरगढ़ किले का ​विहंगम दृश्य - फोटो : Amar Ujala
जयपुर और आमेर की सुरक्षा की दृष्टि से इस किले का निर्माण 1734 में सवाई जयसिंह ने शुरू करवाया। इस किले का नाम सुदर्शन किला रखा गया, लेकिन इस किले के निर्माण के समय व्यवधान होने लगा। दिनभर में हुआ निर्माण काम रात में स्वत: नष्ट हो जाता था। राजा ने इस मामले में तांत्रिकों की सलाह ली। तो बताया गया कि इस इलाके में एक नाहरसिंह भौमिया का प्रभाव है। दरअसल, किसी युद्ध में नाहरसिंह नामक सैनिक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे और वे इस किले का निर्माण नहीं होने दे रहे थे। तांत्रिकों की सलाह पर उन्हे मनाया गया और उनके नाम पर इस किले का नामकरण किया था उनके मंदिर की स्थापना आगरा रोड पर घाट की गूणी में की गई, तब जाकर यहां किले का निर्माण पूरा हो सका।
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