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B'day special: भगत सिंह ने भाई को बुलाया था जेल, अंतिम चिट्ठी में दिया ये संदेश

Tue, 27 Sep 2016 08:07 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 27 Sep 2016 08:07 PM IST
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 Special Story over Martyr Bhagat singh on his birth anniversary
भगत सिंह
उन्हें ये फिक्र है हरदम, नया तर्जे जफा क्या है? हमें ये शौक देखें, सितम की इंतहा क्या है। भगत सिंह की ये पंक्तियां उनके हौसले और देशभक्ति की भावना को दर्शाती हैं।



भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को गांव बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में एक बच्चे का जन्म हुआ था। उस समय किसी को ये अंदाजा नहीं था कि मात्र 23 साल की उम्र में वह ऐसा काम कर जाएंगे कि आने वाली नस्लें नजीर देंगी।

अपने दो क्रांतिकारी दोस्तों सुखदेव थापर और राजगुरु के साथ मौत को गले लगाने वाले भगत सिंह को एक नहीं कई मौतों के चक्र से गुजरना पड़ा था।


भगत सिंह को फांसी की सजाई जा चुकी थी और 24 मार्च की तारीख तय हो गई थी। सजा से कुछ दिन पहले उनकी मां विद्यावती उनसे मिलने पहुंचीं तो उन्होंने कहा था कि मां मेरा शव लेने आप नहीं आना। कुलबीर (भाई) को भेज देना। भगत ने कहा, 'यदि आप आएंगी तो आप रो पड़ेंगी और मैं नहीं चाहता कि लोग ये कहें कि भगत सिंह की मां रो रही है।'
 
 Special Story over Martyr Bhagat singh on his birth anniversary
भगत सिंह
उस समय की अंग्रेजी हुकूमत पूरे देश से मिल रहे इन क्रांतिकारियों को समर्थन से हिलकर रही गई थी। इसके बाद 23 मार्च, 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी के वक्त भी भगत सिंह मुस्कुरा रहे थे। उनके चेहरे पर शिकन पर कोई निशान नहीं था। 

फांसी की कार्रवाई शुरू होने से पहले भगत सिंह ने अपनी ऊंची आवाज में देश को एक छोटा सा संदेश भी दिया। भगत सिंह ने कहा कि आप नारा लगाते हैं, इंकलाब जिंदाबाद, मैं ये मानकर चल रहा हूं कि आप वास्तव में ऐसा ही चाहते हैं। अब आप सिर्फ अपने बारे में सोचना बंद करें, व्यक्तिगत आराम के सपने को छोड़ दें, हमें इंच-इंच आगे बढ़ना होगा। 
 
 Special Story over Martyr Bhagat singh on his birth anniversary
भगत सिंह
इसके लिए साहस, दृढ़ता और मजबूत संकल्प चाहिए। कोई भी मुश्किल आपको रास्ते से डिगाए नहीं। किसी विश्वासघात से दिल न टूटे। पीड़ा और बलिदान से गुजरकर आपको विजय प्राप्त होगी। ये व्यक्तिगत जीत क्रांति की बहुमूल्य संपदा बनेंगी।

फांसी के उस पुराने मचान पर जाने से पहले एक बार फिर तीनों से उनकी आखिरी ख्वाहिश पूछी गई। तीनों ने एक साथ जवाब दिया, हम एक दूसरे से गले मिलना चाहते हैं। लड़खड़ाते हाथों से जल्लाद ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के चेहरे पर नकाब ढके और फिर तीनों को फांसी दे दी गई।
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 Special Story over Martyr Bhagat singh on his birth anniversary
भगत सिंह
22 मार्च 1931 को अपने आखिरी पत्र में भगत सिंह ने लिखा, 'साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं, लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैंद होकर या पाबंद होकर न रहूं। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है। इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था। मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह की उम्मीद करेंगी। इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।'
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