कानून के साथ-साथ मेडिकल और सामाजिक पहलुओं से जुड़ी इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला तो आ गया। कोर्ट ने पैसिव यूथेनेसिया और लिविंग विल को कुछ शर्तों पर मंजूरी भी दे दी। इच्छा मृत्यु का मामला खबरों में तब आया जब केरल की रहने वाली अरुणा शानबाग के लिए मृत्यु की मांग की गई थी। आपको क्या लगता है कि भारत में सिर्फ अरुणा के लिए ही ऐसा किया गया। जी नहीं, अरुणा के अलावा और भी लोगों ने इच्छा मृत्यु की मांग की थीं जो खारिज हो गई थीं। आपको बताते हैं ऐसे ही कुछ मामलों के बारे में :
इच्छा मृत्यु के अभाव में दर्दभरी रही इनकी जिंदगी
अरुणा शानबाग
खुशहाल अरुणा की जिंदगी उस दिन बर्बाद हो गई, जिस दिन मुंबई के केईएम अस्पताल की डॉग रिसर्च लेबोरेटरी में उसके साथ बलात्कार की कोशिश की गई। दरअसल अरुणा को पता लगा था कि अस्पताल का ही एक कर्मचारी सोहनलाल कुत्तों के लिए लाए जाने वाले मीट की चोरी करता था। अरुणा ने इसकी शिकायत प्रबंधन से कर दी थी।
इससे गुस्साए सोहनलाल ने 27 नवंबर 1973 को रेप में असफल रहने पर कुत्तों को बांधने वाली चेन से अरुणा का गला घोंट दिया। इससे अरुणा की मौत तो नहीं हुई पर उसके दिमाग तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गई। नतीजतन उनका पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। 42 सालों तक अरुणा अस्पताल के बिस्तर पर रहीं। उनकी हालत को देखते हुए अस्पताल की नर्स पिंकी विरानी ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में दया मृत्यु की याचिका दायर की। जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। फिर 18 मई 2015 को 66 साल की उम्र में अरुणा की मृत्यु हो गई।
डेनिस कुमार
कन्याकुमारी में रहने वाले एक शख्स ने अपने 6 साल के बच्चे के लिए दया मृत्यु की गुहार लगाई थी। इस बच्चे का नाम डेनिस है, जिसे बोन सिंड्रोम है। जन्म के दौरान इलाज में हुई लापरवाही से उसकी ऐसी हालत हुई। ऐसे में एक पिता जो अपने बच्चे की दर्दनाक स्थिति देख नहीं पा रहा था उसने दया मृत्यु मांगने का फैसला किया। दरअसल उनकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि वे डेनिस के इलाज में खर्च होने वाली रकम जुटा सकें। एम्स के डॉक्टरों ने भी प्राथमिक जांच में अपने हाथ खड़े कर दिये थे। डेनिस एक ब्रेन डेड बच्चा है, जो न तो उठ सकता है और ना ही बोल सकता है। डेनिस की दया मृत्यु याचिका 2013 में खारिज कर दी गई थी।
जीत नारायण
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के रहने वाले जीत नारायण की याचिका 2008 में खारिज हो गई थी। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से अपने चार बेटों दुर्गेश (23), सर्वेश (20), बृजेश (18) और सुशील (16) के लिए इच्छा मृत्यु की इजाजत मांगी थी। उनके चारों बेटे जानलेवा बीमारी 'मस्क्यूलर डिस्ट्राफी' से ग्रसित थे। स्थानीय तौर पर उन्होंने अपने बच्चों का इलाज करवाया लेकिन कोई असर नहीं हुआ। डॉक्टरों के अनुसार इस बीमारी में मरीज 25 वर्ष से अधिक नहीं जी सकता। बेटों की ऐसी हालत देखना जीत नारायण और उनकी पत्नी के लिए आसान नहीं था।
दिलीप माचुआ
झारखंड के रहने वाले माचुआ का 2008 में एक्सीडेंट हुआ जिसके बाद उन्हें लकवा मार गया। उनके परिवार ने उन्हें इच्छा मृत्यु देने की याचिका लगाई, जिसे खारिज कर दिया गया। हालांकि इसके कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गई।
एसिड अटैक विक्टिम
झारखंड की रहने वाली लड़की की 2003 में याचिका खारिज कर दी गई। उसने याचिका दायर कर कहा था कि उसे इच्छा मृत्यु दे दी जाए। यदि ऐसा नहीं हो सकता तो उसे उसकी स्किन के पुनर्निर्माण की चिकित्सा के लिए मदद दी जाए। वह बहरेपन का शिकार हो गई थी साथ ही पूरी तरह से देख भी नहीं पाती थी। उसकी आंख, नाक समेत पूरा चेहरा जल चुका था। अपने इलाज का खर्चा उठाने में भी सक्षम नहीं थी। जिस कारण उसने सरकार से मांग की कि या तो उसे इलाज के लिए आर्थिक सहायता दी जाए नहीं तो इच्छा मृत्यु दी जाए।