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राजनीति: क्या मानसून सत्र की औपचारिक समाप्ति की अधिसूचना जारी हुई? कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल

Wed, 09 Sep 2026 05:52 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Wed, 09 Sep 2026 05:52 PM IST
सार

संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए 27 दिन बीत चुके हैं, लेकिन सरकार ने अब तक इसका औपचारिक सत्रावसान नहीं किया है। कांग्रेस ने इस असामान्य देरी पर गंभीर सवाल उठाते हुए आशंका जताई है कि पर्दे के पीछे कुछ संदिग्ध चल रहा है? कांग्रेस का आरोप है कि सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए जुगाड़ की फिराक में है। क्या वाकई सत्र को जीवित रखकर कोई राजनीतिक रणनीति बनाई जा रही है? आइए, विस्तार से पूरे को समझते हैं...

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Why Has Parliament Monsoon Session Not Been Prorogued for 27 Days Congress Questions Govt Intentions
जयराम रमेश, कांग्रेस नेता - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद भी मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान यानी प्रोरोगेशन न किए जाने को लेकर देश की सियासत गरमा गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्र सरकार की मंशा पर कड़े सवाल खड़े किए हैं और आरोप लगाया है कि इस असामान्य देरी के पीछे 'कुछ तो गड़बड़' है। 

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संसद के दोनों सदन 13 अगस्त को ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिए गए थे, लेकिन करीब चार हफ्ते बीत जाने के बावजूद राष्ट्रपति की ओर से सत्र की औपचारिक समाप्ति की अधिसूचना जारी नहीं की गई है। कांग्रेस का दावा है कि सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की संदिग्ध कोशिशों में लगी हुई है।

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सत्रावसान में देरी पर कांग्रेस ने क्या गंभीर सवाल उठाए?

कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने बुधवार को सरकार के इस कदम पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर संसद के दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के तीन से चार दिनों के भीतर सत्रावसान की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। इससे पहले साल 2015 में दोनों सदनों के स्थगित होने और सत्रावसान के बीच 28 दिनों का सबसे लंबा अंतर दर्ज किया गया था। इस बार मानसून सत्र के स्थगित हुए 27 दिन पूरे हो चुके हैं और जल्द ही यह पुराना रिकॉर्ड भी टूटने वाला है। जयराम रमेश ने आशंका जताई कि क्या सरकार पर्दे के पीछे कोई बड़ी साजिश रच रही है।

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क्या दो-तिहाई बहुमत जुटाने के लिए पार्टियां तोड़ने की हो रही है कोशिश?

कांग्रेस महासचिव ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में निश्चित रूप से कुछ बहुत ही संदिग्ध चल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार संसद में 'सुपर-टेंटेड' यानी दागी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की लगातार कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि सरकार अन्य राजनीतिक दलों को तोड़ने में जुटी हुई है, लेकिन वह अपने इस लक्ष्य से अभी बहुत दूर है और उसके पास जरूरी संख्याबल नहीं है। रमेश ने दावा किया कि चाहे जो भी हथकंडे अपनाए जाएं, सरकार परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए यह संदिग्ध दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में कभी भी कामयाब नहीं हो पाएगी।

बजट सत्र में क्यों गिरा था परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक?

  • इस पूरे राजनीतिक विवाद की जड़ें पिछले बजट सत्र से जुड़ी हुई हैं। बजट सत्र के दौरान 17 अप्रैल को मोदी सरकार को लोकसभा में एक बड़ा झटका लगा था। तब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण को लागू करने के उद्देश्य से लाया गया परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन में गिर गया था।
  • उस समय सदन में मतदान करने वाले कुल 528 सांसदों में से 298 सांसदों ने विधेयक के समर्थन में वोट दिया था, जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया था। किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसके लिए उस दिन सदन में कम से कम 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन सरकार जरूरी आंकड़े से काफी पीछे रह गई थी।

 

मानसून सत्र के सत्रावसान और मतदान से जुड़े अहम आंकड़े 

  • सत्र का स्थगन... लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों को 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया गया था।
  • सत्रावसान में बीता समय... सदनों के स्थगन के बाद 27 दिन बीत चुके हैं और 2015 के 28 दिनों के रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है।
  • सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया... आमतौर पर संसद की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के 3 से 4 दिनों में सत्रावसान हो जाता है।
  • पक्ष और विपक्ष के वोट... विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े थे, जबकि विपक्ष में 230 सदस्यों ने मतदान किया था।
  • बहुमत के लिए जरूरी संख्या... दो-तिहाई विशेष बहुमत हासिल करने के लिए 352 वोटों की दरकार थी, जिसमें सरकार 54 वोटों से पिछड़ गई थी।

 

क्या सत्र को जीवित रखकर दोबारा बिल लाने की तैयारी है?

संसदीय परंपराओं और नियमों के मुताबिक जब तक किसी सत्र का विधिवत सत्रावसान नहीं होता, तब तक तकनीकी रूप से वह सत्र जीवित माना जाता है। ऐसे में सरकार किसी भी समय बहुत कम नोटिस पर दोबारा सदन की बैठक बुला सकती है। कांग्रेस इसी तकनीकी पहलू को लेकर आशंकित है कि सरकार नए सिरे से सत्र बुलाने की औपचारिकताओं से बचने और विपक्षी दलों में सेंध लगाकर विधेयक को फिर से सदन के पटल पर रखने की फिराक में है।

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