हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए सोमवार को मतदान खत्म हो गया। हरियाणा में 65.57 फीसदी वोट पड़े जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव में यहां 76.13 फीसदी वोटिंग हुई थी। जाहिर है पिछले चुनाव में बंपर वोटिंग हुई थी लेकिन इस बार लोगों का उत्साह बहुत कम रहा।
हरियाणा-महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कम वोटिंग के आखिर मायने क्या हैं?
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आखिर कम वोट पड़ने का मतलब क्या है?
हरियाणा में 2009 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत 72.3 था और 2014 में करीब चार प्रतिशत बढ़ गया। चार प्रतिशत ज्यादा टर्नआउट रहा तो हरियाणा में सरकार बदल गई। पहली बार बीजेपी प्रदेश में अपने दम पर सत्ता में आई। 2014 में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता उफान पर थी और बीजेपी ने इसका फायदा हरियाणा में भी उठाया।
बीजेपी का 2009 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में वोट शेयर 9.1 फीसदी था जो 2014 में 33.2 फीसदी पर पहुंच गया। 2009 से पहले हरियाणा में बीजेपी ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी आईएनएलडी की जूनियर हुआ करती थी। जब 2009 में पहली बार बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया तो चार सीटों पर ही सिमट गई थी।
2005 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में 71.9 फीसदी लोगों ने वोट किया था और सरकार बदल गई थी। कांग्रेस आईएनएलडी को हराकर सत्ता में आई थी। साल 2000 के विधानसभा चुनाव में 69 फीसदी टर्नआउट रहा था।
मतलब 2005 और 2009 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के टर्नआउट ट्रेंड को देखें तो पता चलता है कि वोटिंग प्रतिशत बढ़ने पर सत्ताधारी पार्टी को ही जीत मिली है। लेकिन 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में ऐसा नहीं हुआ।
2014 में 2009 के हरियाणा विधानसभा चुनाव की तुलना मे वोटिंग प्रतिशत लगभग चार फीसदी ज्यादा था लेकिन सरकार बदल गई। लेकिन दिलचस्प है कि 2014 में जिस उत्साह से हरियाणा की जनता ने बीजेपी को सत्ता सौंपी थी वो उत्साह इस बार नहीं दिखा।
हरियाणा में साल दो हजार से लगातार वोट प्रतिशत बढ़ता रहा है। 2000 के बाद पहली बार हुआ है जब हरियाणा विधानसभा चुनाव में वोटिंग टर्नआउट में भारी गिरावट आई है। इतना को साफ है कि 2014 में हरियाणा के लोगों ने बीजेपी के प्रति जितनी दिलचस्पी दिखाई थी उतनी इस बार नहीं दिखी।
महाराष्ट्र चुनाव के ट्रेंड के मायने
महाराष्ट्र में 2009 के विधानसभा चुनाव में 59.6 फीसदी लोगों ने वोट किया था और 2014 के विधानसभा चुनाव में लगभग चार प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी और सत्ता बीजेपी के पास चली गई।
साल 2004 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 63.4 फीसदी लोगों ने वोट किया था। मतलब 2009 में 2004 की तुलना में लगभग चार प्रतिशत कम लोगों ने वोट किया तब भी सत्ता कांग्रेस के पास ही रही।
1999 के विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र में वोटिंग टर्नआउट 60.9 फीसदी रहा था। मतलब महाराष्ट्र में हरियाणा की तरह कोई वोट प्रतिशत बढ़ने और घटने का तय पैटर्न नहीं है। दूसरी तरफ हरियाणा में 2014 के विधानसभा चुनाव की तरह महाराष्ट्र के लोगों ने बहुत उत्साह के साथ बीजेपी को सत्ता नहीं सौंपी थी।
महाराष्ट्र में 2014 में जब बीजेपी और शिवसेना सत्ता में आई तो 2009 की तुलना में करीब चार प्रतिशत ज्यादा ही टर्नआउट रहा था जबकि हरियाणा में 2009 की तुलना में 2014 में दस फीसदी से ज्यादा लोगों ने वोट किया था।
दोनों राज्यों में पांच सालों से भाजपा की सत्ता
दोनों राज्यों में पिछले पांच सालों से बीजेपी सत्ता में है और इस साल संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार कोई नया जनादेश आएगा। इन चुनावों के नतीजों से ये भी साफ हो जाएगा कि बीजेपी और मजबूत होगी या विपक्ष में जान आएगी।बीजेपी ने दोनों राज्यों की बुनियादी समस्याओं को छोड़ राष्ट्रीय सुरक्षा को मुद्दा बनाया। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के चुनावी रैलियों में अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान प्रमुखता से छाए रहे।
दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस आपसी कलह से जूझती रही और उसने बुनियादी समस्याओं को मुद्दा बनाने की कोशिश की। राहुल ने अपनी रैलियों में आर्थिक मंदी और बेरोजगारी को मुद्दा बनाने की कोशिश की।
चुनावी कैंपेन के बीच केंद्रीय जांच एजेंसियों ने विपक्षी नेताओं के पुराने मामले भी खोले। मतदान के एक दिन पहले भारतीय सेना की तरफ से पाकिस्तान नियंत्रित इलाके में कथित आतंकवादी कैंपों के खिलाफ ऑपरेशन करने की घोषणा की गई।
अगले दिन अखबारों में आर्मी की घोषणा सुर्खियां बनीं। हालांकि बीजेपी ने दोनों राज्यों में किसानों और बेरोजगारों को लेकर जो वादे किए थे उन पर बात न के बराबर हुई।
दोनों राज्यों में विपक्षी पार्टियों में नेतृत्व का संकट, फिर भी यह दौड़ जारी
दोनों राज्यों के चुनाव में विपक्षी पार्टियों में नेतृत्व का संकट साफ दिखा। राहुल गांधी ने दोनों राज्यों में कुछ रैलियां कीं लेकिन पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी खराब सेहत के कारण कोई रैली नहीं कर पाईं।
दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने दोनों राज्यों में जमकर कैंपेन किए। शाह और मोदी ने अनुच्छेद 370, पाकिस्तान और एनआरसी का भी मुद्दा उठाया। पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी किए जाने के बाद कोई पहला जनादेश आने वाला है।