सूर्य जिस भी राशि में प्रवेश करते हैं उसे उसी राशि की संक्रांति कहा जाता है। आज से सूर्य देव मिथुन राशि में प्रवेश कर चुके हैं। इस दिन मिथुन संक्रांति मनाई जाएगी। सूर्य यहां मंगल, बुध और राहु के साथ युति करेंगे। इसके साथ ही 21 जून को मिथुन राशि में ही सूर्य ग्रहण भी लगेगा। सूर्य के इस गोचर का प्रभाव सभी राशियों पड़ेगा।
आज से एक महीने तक मिथुन राशि में रहेंगे सूर्य देव, इसी राशि में लगेगा सूर्य पर ग्रहण, जानिए क्या है इसका महत्व
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क्या है मिथुन संक्रांति
पंडित देवेंद्र प्रताप मिश्र के अनुसार मिथुन संक्रांति पर भगवान सूर्यदेव के साथ धरती माता की भी पूजा की जाती है। मिथुन संक्रांति साल में पड़ने वाली 12 संक्रांतियों में से एक है। इस दिन सूर्य वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करता है। इसके अन्य राशियों में भी नक्षत्र की दिशा बदल जाती है। इस दिन पूजा-अर्चना के साथ स्नान-दान का भी विशेष महत्व है। मिथुन संक्रांति के बाद से वर्षा ऋतु शुरू हो जाती है।
मिथुन संक्रांति का महत्व
पंडित बृजेश पांडेय के अनुसार सूर्य हर राशि में एक महीने तक विराजमान रहते हैं और सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करने को सूर्य संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन अगर दान-दक्षिणा और पूजा-पाठ किया जाए तो वह काफी फलदायी होता है। मिथुन संक्रांति का पर्व एक ऐसा है जिसके बाद वर्षा ऋतु लग जाती है।
मिथुन संक्रांति पूजा की विधि
ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार मिथुन संक्रांति में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है लेकिन इस संक्रांति पर सिल बट्टे को भूदेवी के रूप में पूजा जाता है।
सिलबट्टे को इस दिन दूध और पानी से स्नान कराया जाता है। इसके बाद सिलबट्टे पर चंदन, सिंदूर, फूल व हल्दी चढ़ाते हैं। इससे पूर्व सिल बट्टे को अच्छे से साफ करके रख दिया जाता है, साथ ही उसमें मसाले आदि भी पीसे जाते हैं।