रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का बोझ उठाकर अपना गुजारा करने वाले कुलियों पर कोरोना की बड़ी मार पड़ी है। लॉकडाउन में उनके सामने रोजी-रोटी का संकट है। ज्यादातर कर्ज के बोझ तले दबे हैं। कुछ तो दूसरे जिलों के हैं जो शहर में किराये के मकानों में रहते हैं। लॉकडाउन में घर भी नहीं जा सके। उधार और दूसरों के सहयोग से चूल्हा बड़ी मुश्किल से जल पा रहा है।
रोजी-रोटी के लिए मोहताज हुए सारी दुनिया का बोझ उठाने वाले ये लोग, ऐसे बिता रहे हैं दिन
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कुछ ट्रेनों की आवाजाही के बाद भी उनका संकट कम होता नहीं दिख रहा है। रेलवे स्टेशन पर पंजीकृत कुलियों से बात की गई तो उनका दर्द छलक पड़ा। बोले, श्रमिक स्पेशल आ रही है लेकिन हमें जाने की इजाजत नहीं है। कुछ ट्रेनें चलाई जाने वाली हैं लेकिन वे भी इधर से होकर नहीं जाएंगी। वैसे भी इस संकट में ज्यादा सामान लेकर कोई नहीं चलेगा। कोरोना ने तो हमें भूखमरी की कगार पर ला दिया है।
पांच हजार रुपये कर्ज हो गया
धर्मशाला बाजार के मो. वसी ने बताया कि लॉकडाउन जबसे लागू है, घर पर ही बैठे हैं। कमाकर बचाए रुपये भी खर्च हो गए। पांच हजार रुपयों का कर्जदार भी हो गया। ट्रेनें चलेंगी तो भी इतना सामान लेकर कोई नहीं जाएगा कि हमारी जरूरत पड़े। हमारा तो धंधा ही चौपट हो गया।
बस्ती के जाहिद अली ने बताया कि किराए पर कमरा लेकर परिवार के साथ रहता हूं। लॉकडाउन में घर भी नहीं जा सका। किसी तरह जुगाड़ और दूसरों की दरियादिली से घर का चूल्हा जल रहा है। एक हजार रुपये सरकार देने वाली थी, अभी तक बैंक खाते में नहीं पहुंचें हैं।
गोरखपुर जंक्शन पर इस समय 139 कुली पंजीकृत हैं। इन कुलियों को रेलवे की ओर से बिल्ला आवंटित किया गया है। इनमें कई कुली दूसरे जिलों से आकर शहर में रहते हैं।
यात्रियों का बोझ उठा सकते, पार्सल नहीं
रेलवे द्वारा कुलियों को इंगेज करते समय यह तय किया जाता है कि कुलियों को सिर्फ यात्रियों का लगेज उठाना है, पार्सल आदि नहीं उठाना है। लॉकडाउन में रेलवे ने पार्सल ट्रेन चलाई है लेकिन लाइसेंसधारी कुली इस ट्रेन से आए पार्सल को नहीं उठा सकते।