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यहां मौजूद है 'मोहम्मद साहब' के पैरों के निशान, 176 साल पुराना है गिलाफ-ए-काबा का इतिहास

Mon, 15 Jun 2020 08:27 AM IST
vivek shukla अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 15 Jun 2020 08:27 AM IST
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Historical things present in vegetable house located in Jaffra market gorakhpur
सब्जपोश हाउस - फोटो : अमर उजाला।

गोरखपुर शहर अपने अंदर हजारों वर्षों का इतिहास समेटे हुए है। बात अगर इस्लामिक दृष्टि से करें तो इस मामले में भी शहर का कोई जवाब नहीं। यहां का इस्लामिक इतिहास काफी समृद्ध रहा है। शहर के जाफरा बाजार स्थित सब्जपोश हाउस में मिस्त्र का बना 176 साल पुराना गिलाफ-ए-काबा है। इसके साथ ही यहां मदीना से लाए गए पत्थरों पर बने मोहम्मद साहब के पैरों के निशान (कदम-ए-रसूल) और गौस-ए-पाक की मजार से लाया पत्थर भी मौजूद है। इन्हें जियारत के लिए ईल-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा में जाफरा बाजार मस्जिद में नमाज के बाद रखा जाता है।

Historical things present in vegetable house located in Jaffra market gorakhpur
सब्जपोश हाउस - फोटो : अमर उजाला।

यह है इतिहास
सब्जपोश हाउस में 176 साल पुराना गिलाफ-ए-काबा, मदीना से लाया गया कदम-ए-रसूल (पैगंबर-ए-आजम हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के पैर के निशान) व बगदाद से लाया गया गौसे पाक हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी अलैहिर्रहमां के मजार का पवित्र पत्थर मौजूद है। जिसकी जियारत ईद-उल-फित्र व ईद-उल-अजहा के मौके पर करवाई जाती है। इन पवित्र वस्तुओं को 1840 में मीर अब्दुल्लाह पवित्र हज यात्रा के दौरान वापसी में लेकर आए थे।

सैयद दानिश अली सब्जपोश के मुताबिक उनके वंशज मीर शाह क्यामुद्दीन शाहजहां के शासन काल में गोरखपुर तशरीफ लाए और यहीं छोटा-सा रौजा व मस्जिद बनाई। यहीं पर हजरत मीर सैयद क्यामुद्दीन शाह अलैहिर्रहमां (आप सौ बरस से ज्यादा जिंदा रहे। निधन इस्लामी माह 8 सफर 1128 हिजरी में हुआ) की मजार है। वहीं थोड़ी दूर पर उनके पोते मीर सैयद गुलाम रसूल का रौजा या मकबरा है।

Historical things present in vegetable house located in Jaffra market gorakhpur
सब्जपोश हाउस - फोटो : अमर उजाला।

लोगों का कहना है कि रौजे के गुबंद में उस जमाने की कुरान शरीफ व हजरत अली के तबरुकात मौजूद है। जौनुपर से गोरखपुर तशरीफ लाए मीर शाह क्यामुद्दीन के दो साहबजादे मीर अहमदुल्लाह व मीर फजलुल्लाह थे। मीर फजलुल्लाह अवध के फौज में जनरल थे, उन्होंने बक्सर के युद्ध में वतन की आजादी के लिए लड़ते हुए शहादत पाई। इनकी कोई औलाद नहीं थी। लिहाजा उस दौर के बादशाह ने मीर सैयद गुलाम रसूल को माफी नामा, रकम व गांव मिले।

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सब्जपोश हाउस - फोटो : अमर उजाला।

हदिया देकर लिया गिलाफ
इसके बाद हज करने वह अरब पहुंचे। वहां खाना-ए-काबा का गिलाफ बदला जा रहा था। उन्होंने गिलाफ के एवज में हदिया दिया और उसका एक बड़ा टुकड़ा ले लिया। उस दौरान हदिया देकर खास लोगों को काबा शरीफ का गिलाफ देने की परंपरा थी। मीर अब्दुल्लाह भी रूउसों में शुमार थे। उन्हें भी यह दस्तयाब किया गया। वहीं अरब से ही उन्हें कदमें रसूल भी मिला, जिसे लेकर वह गोरखपुर आ गए और तब से यह सब्जपोश खानदान की देखरेख में रखा हुआ है।

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सब्जपोश हाउस - फोटो : अमर उजाला।

मस्जिद में होती है जियारत
दानिश अली ने बताया कि जबसे यह यहां आया है, तबसे लेकर अब तक इन पवित्र वस्तुओं की जियारत बादशाह शाहजहां के जमाने की बनी मस्जिद में कराई जाती है। गलाफ की खासियत यह है कि काले गिलाफ पर रेशम से कुरान की आयतें लिखी जाती हैं। उन्होंने बताया कि जो लोग काबा शरीफ नहीं जा पाते वह इस पवित्र गिलाफ, कदम-ए-रसूल व हजरत गौसे पाक के मजार के पत्थर की जियारत करने के लिए यहां पहुंचते हैं।

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