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नया खतरा: स्टेरॉयड ला रहा लोगों की जिंदगी में अंधेरा, इस बीमारी को विशेषज्ञ कहते हैं साइलेंट किलर

Sat, 21 Aug 2021 07:43 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 21 Aug 2021 07:43 PM IST
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30 percent of patients with glaucoma disease increased
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।

गोरखपुर में स्टेरॉयड का अधिक इस्तेमाल लोगों की जिंदगी में अंधेरा ला रहा है। स्टेरॉयड के इस्तेमाल से लोग ग्लूकोमा (काला मोतिया बिंद) के शिकार हो रहे हैं। पहले जहां 10 से 15 मरीज मिलते थे वहीं अब यह संख्या 30 तक पहुंच गई है। इनमें पांच प्रतिशत मरीज ऐसे भी हैं जिनकी आंखों की 70 प्रतिशत से अधिक रोशनी जा चुकी है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग की ओपीडी में ऐसे मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है। विशेषज्ञ इस बीमारी को साइलेंट किलर भी कहते हैं।



मेडिकल कॉलेज में नेत्र रोग विभागाध्यक्ष डॉ रामकुमार जायसवाल बताते हैं कि स्टेरॉयड की वजह से मरीजों को पहले ब्लैक फंगस और व्हाइट फंगस जैसी गंभीर बीमारी से जूझना पड़ा। अब यही स्टेरॉयड मरीजों को ग्लूकोमा बीमारी का दर्द दे रहा है। ग्लूकोमा ने इन मरीजों की आंखों की नसों को क्षतिग्रस्त कर दिया है। जब ऐसे मरीजों से दवाओं के बारे में जानकारी ली गई तो पता चला कि इन लोगों ने स्टेरॉयड का इस्तेमाल अधिक किया है। बताया कि ग्लूकोमा को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी है। लोग इस गंभीर बीमारी को नहीं जानते हैं जो धीरे-धीरे मरीजों को अंधा कर दे रही है। अगर स्टेरॉयड का इस्तेमाल इसी तरह से बढ़ता रहा तो लोगों के आंखों को सबसे अधिक खतरा होगा, जिसका इलाज करना मुश्किल होगा।

 

30 percent of patients with glaucoma disease increased
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : social media

इलाज काफी महंगा
डॉ. राम कुमार ने बताया कि इस बीमारी का इलाज भी काफी महंगा है। इलाज में इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत तीन से चार हजार रुपये के बीच हैं। मरीजों की स्थिति के अनुसार इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। जरूरत पड़ने पर मरीजों का ऑपरेशन भी करना पड़ता है। सही समय पर इलाज अगर हो जाता है तो आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है।

 

30 percent of patients with glaucoma disease increased
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

यह है ग्लूकोमा
ग्लूकोमा को आम भाषा में काला मोतियाबिंद भी कहते हैं। आंख के अंदर अंगों के पोषण के लिए तरल पदार्थ निकलता है जो आंख के महीन छिद्र (फिल्टर)  से बाहर निकलता है। उम्र के साथ छिद्र में कुछ दिक्कतें आने लगती है। इसकी वजह से तरल पदार्थ निकल नहीं पाता है। इससे आंख पर दबाव बढ़ जाता है। आंख पर बढ़ा दबाव प्रेशरऑप्टिक नस (आंखों से दिमाग को सिग्नल भेजने वाली नर्व) को खराब कर देता है। इससे आंखों की रोशनी जाने लगती है।

 

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30 percent of patients with glaucoma disease increased
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : iStock
यह हैं लक्षण
धुंधला दिखाई देना। आंखों के सामने रंगीन बुलबुले दिखना। चश्मा लगाने के बाद भी धुंधला दिखाई देना। सिर हमेशा भारी रहना। आंखों में सूखापन लगना। आंसुओं का कम गिरना।
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30 percent of patients with glaucoma disease increased
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।
अनुवांशिक होती है यह बीमारी
ग्लूकोमा के मरीज अपने बच्चों के आंखों की जांच जरूर कराएं। क्योंकि 16 प्रतिशत यह बीमारी अनुवांशिक मानी जाती है। ऐसे में हर हाल में दो साल पर बच्चों के आंखों की जांच कराएं।
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