अभिनेता प्रतीक गांधी ने लंबे समय तक नौकरी करने के साथ साथ अभिनय में भी मेहनत की है। अपने पैरों पर खड़े होने की जिद और इस जिद के सफर में मिले सच्चे हमसफर ने प्रतीक गांधी को यहां तक पहुंचाया है। वह अब ओटीटी के स्टार कलाकार हैं। लेकिन, ओटीटी के स्टार कलाकार प्रतीक गांधी को इस बात का अफसोस है कि उनकी फिल्में सिनेमाघरों में सफल नहीं हो पा रहीं। वह कहते हैं कि लगातार कोशिश करते रहना ही एक कलाकार का धर्म है। प्रतीक की नई फिल्म ‘अग्नि’ सीधे ओटीटी पर रिलीज हो रही हैं। ‘अग्नि’ के कलाकारों व निर्देशक राहुल ढोलकिया से एक खास मुलाकात की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने। यहां चार बातें प्रतीक गांधी से...
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दो और दो प्यार
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘दो और दो प्यार’ देखते समय मैंने तमाम दर्शकों को अपनी सीटों में सुबकते देखा, लेकिन ऐसी अच्छी फिल्मों को देखने भी जब लोग नहीं आते तो दुख तो होता होगा?
हां, मैं ये मानता हूं कि तमाम मेहनत करने के बावजूद जब फिल्म सिनेमाघरों में चलती नहीं है तो बहुत दुख होता है। लेकिन, हम वैज्ञानिकों की तरह हैं। वैज्ञानिकों को अपने सारे सफल प्रयोगों पर भी पेटेंट कहां मिलता है। पर पेटेंट न मिले तो क्या वैज्ञानिक प्रयोग ही न करे। परिश्रम करना, कोशिश करना, कलाकार का धर्म है। ये धर्म दर्शक का है कि सिनेमाघरों में आई अच्छी फिल्मों का साथ दे।
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हंसल मेहता के साथ प्रतीक गांधी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अभी हाल ही में आप वेब सीरीज ‘गांधी’ की शूटिंग करके लौटे हैं, कुछ बताना चाहेंगे इसके बारे में?
‘गांधी’ हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। निर्देशक हंसल मेहता की सीरीज ‘गांधी’ में मेरे किरदार को लेकर लोगों में काफी कौतूहल है और जब भी लोग मुझसे इसके बारे में बात करते हैं, मुझे अच्छा लगता है। अच्छा इस बात के लिए भी लगता है कि गांधी के विचार अब भी, इस समय में भी प्रासंगिक हैं। ‘मोहन नो मसालो’ के मेरे मोनोलॉग का भी जिक्र लोग इस दौरान करते हैं। लेकिन, दोनों के संदर्भ एक दूसरे से काफी अलग हैं।
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दो और दो प्यार
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अभी निखिल आडवाणी की एक वेब सीरीज आई है ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’। इसमें भी गांधी के किरदार को ही पेश किया गया है...
इस सीरीज में चिराग ने अच्छा काम किया है। आप ध्यान देंगे तो पाएंगे कि ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ की कहानी एक घटना पर है जबकि ‘गांधी’ एक व्यक्तित्व है। मैंने ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ सीरीज अभी तक देखी नहीं है। इसमें बापू का किरदार करने वाला (चिराग वोरा) मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। हम लोगों ने एक साथ खूब थियेटर किया है। मैंने सुना है कि उसने इस सीरीज में बहुत अच्छा काम किया है।
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अग्नि
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने लंबे समय तक नौकरी और थियेटर दोनों साथ साथ किया है। मुंबई आने वाले नए कलाकारो को इस सीख से कुछ सीख देना चाहेंगे?
सबसे अहम बात जो मैं अपने चाहने वालों से और अभिनय में दिलचस्पी रखने वालों से बार बार कहता रहता हूं और वो ये कि मुंबई में अगर आप अभिनय को करियर बनाने के लिए दूसरे शहर या राज्य से आ रहे हैं तो आमदनी का कम से कम एक दूसरा जरिया जरूर साथ लेकर आएं। अभिनेता बनकर पैसे कमाना शुरू में मुश्किल है। मैंने भी आठ साल तक नौकरी के साथ साथ अभिनय किया है। जब लगा कि गाड़ी पटरी पर आ गई है तो मैंने नौकरी छोड़ दी।