Nida Fazli: अधूरी मोहब्बत के दर्द ने निदा फाजली को बनाया शायर, सूरदास, तुलसी और बाबा फरीद के लेखन का पड़ा असर
Nida Fazli Death Anniversary: सिनेमा की दुनिया में निदा फाजली का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। दिग्गज शायर, गीतकार और संवाद लेखकर निदा साहब तो इस दुनिया में नहीं, मगर उनकी कलम आज भी महका करती है।
विस्तार
आज 08 फरवरी को निदा फाजली की पुण्यतिथि है। सरल अल्फाजों में उन्होंने ऐसे शेर और शायरी कलमबद्ध कीं, जो सीधे लोगों के दिलों में उतरीं। प्यार-मोहब्बत की बात हो या जिंदगी के फलसफे उन्होंने बड़ी खबूसरती से उन्हें भावों में उकेरा। दिल्ली में जन्मे निदा फाजली गीतकार बनने के मकसद से मायानगरी गए। वहां वे कड़े संघर्ष के दौर से गुजरे। सिनेमा की दुनिया में उन्होंने यादगार गीत दिए हैं। आइए जानते हैं उनके बारे में....
विरासत में मिला शायरी का शौक
निदा फाजली का जन्म 12 अक्तूबर 1938 को दिल्ली में पिता मुर्तुजा हसन और मां जमील फातिमा के घर तीसरी संतान के रूप में हुआ। नाम रखा गया मुक्तदा हसन। लेखन की दुनिया में इनका नाम निदा फाजली पड़ा और आज दुनिया इसी नाम से जानती है। निदा फाजली का बचपन ग्वालियर में बीता और वहीं पर इनकी शिक्षा पूरी हुई। निदा फाजली के पिता खुद एक शायर थे, लिहाजा इन्हें भी यह शौक विरासत में मिला। वे बहुत कम उम्र से लिखने लगे थे। कहा जाता है कि अधूरी मोहब्बत के दर्द ने उनके लेखन के इस शौक को विस्तार दिया।
अधूरी मोहब्बत के दर्द ने दी कलम को धार
कहा जाता है कि निदा फाजली जिन दिनों कॉलेज में पढ़ा करते थे, तब उनकी आगे की लाइन में एक लड़की बैठा करती थी। उससे उन्हें लगाव महसूस होने लगा। एक दिन अचानक नोटिस बोर्ड पर निदा फाजली को उस युवती के बारे में पढ़ने को मिला कि, 'कुमारी टंडन का एक्सीडेंट में निधन हो गया है'। निदा फाजली का दिल बैठ गया। इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने अब तक कुछ भी तो ऐसा नहीं लिखा, जो उस गम को बयां कर सके।
बच्चों से था बेहद लगाव
निदा साहब बच्चों से बेहद प्यार करते थे। उनकी लेखन में भी यह झलकता है। अपने तकरीबन सभी मुशायरों में वे बच्चों से जुड़े दो-चार शेर जरूर सुनाते थे। उनके इन शेर से तो बखूबी समझा जा सकता है कि वे बच्चों में खुदा का रूप देखा करते थे-
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए
बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे
बॉलीवुड में लिखे ये लोकप्रिय गीत
निदा फाजली 60 के दशक में फिल्मों में गीतकार बनने का मकसद लेकर मुंबई पहुंचे। उन्होंने बॉलीवुड में ज्यादा गाने नहीं लिखे, लेकिन जितने भी लिखे वे आज भी लोकप्रिय हैं। फिल्म 'सरफरोश' में उनकी गजल 'होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है', जबरदस्त हिट हुई। उन्हे पहला मौका मशहूर निर्माता निर्देशक कमाल अमरोही ने फिल्म 'रजिया सुल्ताना' में दिया। कमल अमरोही की इस फिल्म में उन्होंने दो गाने लिखे- 'तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है'। ये गाना निदा फाजली का पहला गाना बना। इस फिल्म में एक गाना और लिखा -'आई जंजीर की झंकार, खुदा खैर कर'। ये दोनों ही गाने बहुत लोकप्रिय हुए। फिल्म राजिया सुल्तान के बाद बॉलीवुड में निदा फाजली की पहचान बन गई। इसके बाद उन्होनें 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता', 'तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है' जैसे गीत लिखकर बॉलीवुड में धूम मचा दी।
जगजीत सिंह से था याराना
फिल्मी दुनिया में निदा फाजली की दोस्ती मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह से हुई। ये दोस्ती बहुत गहरी थी। जगजीत सिंह के गजल गायकी को एक मुकाम देने में निदा फाजली की गजलों का बड़ा योगदान है। जगजीत सिंह की मखमली आवाज में उनकी लिखी गजल 'दुनिया जिसे कहते हैं, मिट्टी का खिलौना है' और 'हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी' बहुत ही लोकप्रिय हुईं। इसके बाद जगजीत सिंह ने उनकी लिखी कई अन्य गजलों को भी अपनी आवाज से सजाया। अपने लेखन के लिए निदा फाजली को साहित्य अकादमी से लेकर कई राज्यों की हिंदी और ऊर्दू अकादमी के पुरस्कार मिले। साल 2013 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा। 08 फरवरी 2016 को मुंबई में उनका निधन हो गया था।