Movie Review: मारा
कलाकार: आर माधवन, श्रद्धा श्रीनाथ, मौली, अलेक्जेंडर बाबू, अभिरामी आदि।
लेखक: बिपिन (मलयालम फिल्म ‘चार्ली’ पर आधारित)
लेखक, निर्देशक: दिलीप कुमार
रेटिंग: ***
भारत में सिनेमा अपनी भाषाई बंदिशें पार कर चुका है। भारतीय सिनेमा का नया दर्शक अच्छा सिनेमा देखना चाहता है। भाषा उसकी कुछ भी हो। दक्षिण की हिंदी में डब होने वाली फिल्में फ्री टू एयर मूवी चैनलों पर कब्जा जमाए रहती हैं और अब बिना डब की हुई तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम फिल्में भी अपने गृहराज्यों से अधिक दूसरे भारतीय राज्यों में देखी जाती हैं। तमिल फिल्म ‘मारा’ साल के दूसरे शुक्रवार को ओटीटी पर रिलीज हुई है। ये फिल्म इस बात का संकेत है कि फीलगुड सिनेमा का जमाना लौट रहा है। ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा जैसी कहानियां इस साल का फ्लेवर होने वाली हैं।
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आर माधवन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कोरोना काल में देश, काल और परिस्थिति में फंसे लोगों का जीवन संतुलन खो रहा है। ऐसे में परियों या राजा रानी की कहानियों में खुश रहने वाली एक बच्ची पारू को बस में सफर करते हुए सुनने को मिलती है कहानी एक ऐसे योद्धा की जिसकी जान एक मछली में है। बच्ची बड़ी होती है और एक दिन ऐसे कस्बे में पहुंच जाती हैं जिसकी दीवारों पर बने फुटकर चित्र दूर से खड़े होकर दिखने में एक ही पेटिंग का हिस्सा नजर आते हैं और उसे याद आने लगती है वही कहानी जो उसने बचपन में सुनी थी। पारू अपनी संभावित शादी को छोड़ सोलो ट्रैवेल पर निकली है। रहने को जो ठिकाना उसे मिलता है वह उसी कलाकार का ठिकाना है, जिसके रहस्य को पारू भेदना चाहती है। ‘मारा’ परीलोक से आगे की लोककथा भी है, रहस्य रोमांच की कहानी भी है और इसमें प्रेम का एक ऐसा सूत्र भी है जिसे हम अक्सर ‘प्लैटोनिक लव’ कहते हैं।
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श्रद्धा श्रीनाथ
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘मारा’ संवादों से कम और संकेतों से ज्यादा बोलती है। चेहरों के भावों से संवाद करने वाली फिल्में हमेशा लोगों को आकर्षित करती रही हैं। अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ फिल्म ‘मारा’ देखते समय महसूस ये भी होता कि इंसानी अनुभूतियां, दादी-पोती की अठखेलियां, मांओं की बेटी के विवाह के लिए परेशानियां सब जगह एक जैसी हैं। हर जगह स्त्री विमर्श का नया अध्याय चल रहा है। वह स्वतंत्र होना चाहती है। ये भी समझती है कि महिला सशक्तीकरण का पहला कदम आर्थिक स्वालंबन से शुरू होता है। श्रद्धा श्रीनाथ इन सारी इच्छाओं, आकांक्षाओं और उत्कंठाओं को जीती दिखती हैं।
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आर माधवन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लेकिन, फिल्म शुरू होने के कोई आधे घंटे बाद फिल्म में आते हैं आर माधवन। कमाल का कलाकार है ये इंसान। चेहरे पर वैसे ही मासूमियत जैसी करियर की शुरुआती फिल्मों से दिखती रही है। कलाकार की आत्मा को चोला पहनाया है माधवन ने अपने इस किरदार में। उनके अपने नैसर्गिक गुण रहे हैं इस तरह के चरित्रों को जीने के। हिंदी सिनेमा के 50 के अरते परते के अभिनेताओं की तरह न तो माधवन अब कमर मटकाते दिखते हैं और न ही वह ऐसे किरदारों में दिखते हैं जहां प्रेम का अर्थ बस स्त्री को पा लेना होता है। वह अभिनय के आध्यात्मिक स्तर की तरफ बढ़ते दिखते कलाकार हैं।
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श्रद्धा श्रीनाथ
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘मारा’ तकनीकी रूप से भी बहुत ही उन्नत फिल्म है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी में दिनेश कृष्णन और कार्तिक मुथुकुमार का किस फ्रेम में कौन सा करिश्मा है ये तो वह ही जानें लेकिन समग्र रूप से इस फिल्म में प्रकाश और छाया का संयोजन लाजवाब है। गैर तमिल दर्शकों को फिल्म के संगीत में उतनी रुचि शायद न बने। फिल्म का वीडियो संपादन थोड़ा बेहतर करके इसे ढाई घंटे की बजाय दो, सवा दो घंटे की फिल्म बनाया जा सकता था। खासकर तब, जब इसका ओटीटी पर रिलीज होना तय हो गया था।