निर्माताः सिद्धार्थ रॉय कपूर, अनुराग बसु, रणबीर कपूर
निर्देशकः अनुराग बसु
कास्ट: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, शाश्वत चटर्जी, सौरभ शुक्ला
रेटिंग: *
अगर आप आंखों देखी मक्खी निगलने में यकीन रखते हों तो 'जग्गा जासूस' से बढ़ कर कोई फिल्म नहीं होगी। रणबीर कपूर कूड़ा फिल्में करने का जबर्दस्त रिकॉर्ड बना रहे हैं। एक के बाद एक बेकार से बढ़ कर घटिया फिल्में चुन रहे हैं।
'बेशरम', 'रॉय', 'बॉम्बे वेलवेट' और अब 'जग्गा जासूस'। तय है कि उन्हें कहानी की समझ नहीं और जिनकी राय-सलाह-मशविरों पर वह चलते हैं, वे उन्हें गहरे गड्ढों में धकेल रहे हैं। 'जग्गा जासूस' बच्चों को भी पसंद नहीं आएगी। मगर उससे पहले जरूरी है कि फिल्म समझ आए। कविता-गीतनुमा संवादों का प्रयोग अपनी जगह है परंतु फिल्म की कहानी झोल-झाल से भरी है, जिसमें जीरो एंटरटेनमेंट है। लेखक-निर्देशक अनुराग बसु पूरी तरह दिशाहीन हैं।
यह ‘गलती से मिस्टेक’ टाइप फिल्म नहीं है, जिसमें आप मेहतन का पैसा डुबाएं और मनोरंजन न मिलने पर नजरअंदाज कर दें। यह बड़ी गलती है, जिसे ब्लंडर कहते हैं। फिल्म में शुरू से अंत तक प्रयोग के नाम पर हास्यास्पद अंदाज-ए-बयां है जिसमें कैटरीना कैफ नन्हें-मुन्ने बच्चों को एक मेले में लगे मंडप में 'जग्गा जासूस' की कॉमिक बुक्स पढ़ा रही हैं। कॉमिक्स में जग्गा के किस्से हैं। परंतु जग्गा कहां है, क्यों ये कॉमिक्स हैं और कहानियों से क्या बताने की कोशिश है...
दर्शक शुरू से अंत तक पहेलियां बूझता है। कुछ जवाब हैं परंतु तर्कहीन हैं। पुरुलिया में विदेशियों द्वारा आसमान से हथियार गिराने की घटना (1994) से फिल्म शुरू होती है और पूरी दुनिया में हथियार सप्लाई का विषय सामने आकर रायते की तरह फैल जाता है। जिसे अनुराग और रणबीर समेट नहीं पाते। जग्गा (रणबीर कपूर) हकलाने वाला बच्चा है। उसकी जिंदगी में टूटी-फूटी उर्फ बादल बागची (शाश्वत चटर्जी) नाम के पितातुल्य व्यक्ति की एंट्री होती है।
टूटी-फूटी जग्गा को पालते-पोसते हुए एक दिन अनाथ बच्चों के स्कूल में भर्ती करा के गायब हो जाता है। फिर हर साल बर्थ डे पर जग्गा के पास शुभकामनाओं और जिंदगी जीने के तरीके बताने वाले टूटी-फूटी के वीडियो संदेश आते हैं। बड़े हो चुके जग्गा के पास एक बर्थ डे पर वीडियो नहीं आता। क्यों...? कहां गया टूटी-फूटी...? उसकी सच्चाई क्या है?