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'अंधाधुन रिव्यू': एक बार फिर आयुष्मान खुराना ने की लाजवाब एक्टिंग, कहानी भी जबरदस्त

Fri, 05 Oct 2018 01:20 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Updated Fri, 05 Oct 2018 01:20 PM IST
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ayushmann khurrana film andhadhun review
andhadhun

-निर्माताः वायकॉम18 मोशन पिक्चर्स

-निर्देशकः श्रीराम राघवन

-सितारेः आयुष्मान खुराना, राधिका आप्टे, तब्बू, अनिल धवन

रेटिंग ***

यूं तो फिल्मों के बारे में ज्यादा जानना अच्छा होता है लेकिन अंधाधुन के बारे में जितना कम जानें उतना सही होगा। यह रोचक थ्रिलर है और एक हसीना थी (2004), जॉनी गद्दार (2007) तथा बदलापुर (2015) के बाद आप निर्देशक श्रीराम राघवन पर फिर भरोसा कर सकते हैं। करीब 15 मिनट लंबी फ्रेंच थ्रिलर द पियानो टर्नर (2010, निर्देशकः ओलिवर ट्रेनर) को राघवन ने अपने राइटर्स की टीम के साथ करीब सवा दो घंटे लंबी फिल्म में बदल दिया।

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आप सिनेमा लिखना सीखना चाहते हैं तो यू-ट्यूब पर उपलब्ध द पियानो टर्नर तथा अंधाधुन देख कर समझ सकते है कि कैसे एक छोटे-से प्लॉट को फिल्म के रूप में विकसित किया गया। अंधाधुन का निर्देशन और पटकथा अधिकांश हिस्सों में कसे हुए हैं। हालांकि कुछ लंबे दृश्य और दूसरे हिस्से की थोड़ी शिथिलता फिल्म की रफ्तार को धीमा जरूर करती है लेकिन इसके बावजूद अब क्या होगा वाला रोमांच बना रहता है। अंधाधुन पुणे में रहने वाले नेत्रहीन पियानिस्ट आकाश (आयुष्मान खुराना) की कहानी है, जो एक हत्या का ‘चश्मदीद’ गवाह है।

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लंदन जाकर पियानो बजाने की प्रतिभा मांजने का सपना देखने वाला आकाश इस हत्या के कारण अपने सपनों को बिखरते पाता है तो दूसरी तरफ उसके जीवन में सोफी (राधिका आप्टे) है, जिससे उसे प्यार है। सोफी के पिता के बार/रेस्तरां में आकाश पियानो बजाता है। दूसरी तरफ एक पूर्व उम्रदराज फिल्म स्टार प्रमोद सिन्हा (अनिल धवन) और उसकी युवा-ग्लैमरस पत्नी सिमी (तब्बू) है, जिसकी फिल्मी महत्वाकांक्षाएं जिंदा हैं।

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इन मुख्य कहानियों में कुछ और रोचक किरदार भी हैं, जिनमें एक चंचल-जासूस टाइप बच्चा शामिल है। मगर बड़ा सवाल यह कि जब आकाश देख नहीं सकता तो सब कुछ बयान कैसे कर सकता है? निर्देशक ने यहां दर्शकों से छुपाया नहीं है कि कहानी क्या हुआ, किसने और क्यों हत्या की। लेकिन इसके बावजूद कुछ यहां ऐसा है जिसे जानने की जिज्ञासा बनी रहती है और दर्शक सीट से बंधा रहता है। कहानी में छोटे-छोटे ट्विस्ट-एंड-टर्न हैं और वही इसे रोचक बनाते हैं। थ्रिल वाले कथानक के बीच इस ब्लैक कॉमेडी की टोन राघवन ने संवादों में कॉमिक रखी। अतः यह आभास नहीं होता कि सिर भारी कर देने वाला रोमांच घट रहा है।

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संगीत में अमित त्रिवेदी ने 1970 के दशक का बारीक धागा पिरोया है, जो पुराने को नए से जोड़े रहता है। आयुष्मान खुराना अपने परफॉरमें से फिर छाप छोड़ते हैं। राधिका आप्टे और तब्बू ने अपने किरदारों को पूरी क्षमता के साथ जीवंत किया है। खास तौर पर तब्बू फिल्म खत्म होने के बाद याद रह जाती हैं। अनिल धवन लंबे समय बाद पर्दे पर लौटे और उन्हें देख कर अच्छा लगता है। थ्रिलर कहानियों, उपन्यासों और फिल्मों में आपकी थोड़ी भी रुचि है तो अंधाधुन आपके लिए है।

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