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वन टाइम वाॅॅॅच है 'बत्ती गुल मीटर चालू', फिल्म देखने से पहले पढ़ें रिव्यू

Fri, 21 Sep 2018 03:58 PM IST
रवि बुले, अमर उजाला
रवि बुले, अमर उजाला Updated Fri, 21 Sep 2018 03:58 PM IST
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movie review of shahid kapoor film batti gul meter chalu
batti gul meter chalu

-निर्माताः भूषण कुमार

-निर्देशकः श्रीनारायण सिंह

-सितारेः शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम

रेटिंग **

टॉयलेटः एक प्रेमकथा वाले निर्देशक श्रीनारायण सिंह की बत्ती गुल मीटर चालू देख कर आप यह नहीं कह सकेंगे कि दिमाग की बत्ती जला दे! इतना है कि फिल्म में एंटरटेनमेंट के साथ मिक्स सामाजिक जागरूकता की बातें चालू-बंद होती रहती हैं। थोड़ा एंटरेटनमेंट, थोड़ा मैसेज। बॉलीवुड स्टाइल में। फिल्म भले ही प्रकाश की बात करती हो परंतु ऐसी फिल्में गारंटी नहीं देती कि हमारा सिनेमा अंधेरे से प्रकाश की ओर जा ही रहा है।

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Batti Gul Meter Chalu

इक्का-दुक्का जुगनू टिमटिमाते हैं, बस। बिजली संकट से ग्रस्त उत्तराखंड के टिहरी में कहानी तीरंदाजी प्रतियोगिता से शुरू होती है कि जीतने वालों को इस्तेमाल के लिए छह महीने जनरेटर फ्री मिलेगा। चलती कहानी में यहां रहने वाले बचपन से दोस्त सुशील कुमार पंत (शाहिद कपूर), ललिता नौटियाल (श्रद्धा कपूर) और त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) की दोस्ती का बल्ब तब बीच में फ्यूज हो जाता है जब ललिता अपने अंदाज में तय करती है कि दोनों में से कौन हसबैंड बनने लायक है! बीच-बीच में नाच-गाने चलते हैं और एक हादसा सुशील और ललिता को हिला देता है। सुशील छोटे मोटे उपभोक्ता केस लड़ने वाला वकील है और हादसे के बाद स्थानीय प्राइवेट बिजली कंपनी के खिलाफ ऐलान-ए-जंग कर देता है।

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कोर्ट में उसका मुकाबला फर्राटे से बोलने वाली कंपनी की वकील (यामी गौतम) से है। यहां कुछ मुद्दे की बातें हैं जो छोटे शहरों में बिजली के संकट की सच्चाई सामने लाती है। यहां लेखक-निर्देशक ने कोर्टरूम को थोड़ा कॉमिक रख कर, फिल्म को गंभीर न बनने देने की जो कोशिश की, वह इसे ऊंचा उठने से रोकती हुई बॉलीवुड के रूटीन सिनेमा में बदल देती है। दर्शक अंततः दर्शक बना रहता है। यह साफ हो जाता है कि वह फिल्म देख कर अपनी लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा नहीं होने वाला।

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पद्मावत के लुक से बाहर निकलने की कोशिश करते शाहिद करीने से बनी दाढ़ी और सजे हुए बालों में अधिक बनावटी लगते हैं। उनमें ऊर्जा अच्छी है परंतु इससे उनका किरदार रोशन नहीं होता। उनें छोटे-पहाड़ी शहर के बाशिंदे वाली बात नहीं दिखती। यही श्रद्धा के साथ है। वह मैट्रो वाली लड़की ही लगती हैं। दिव्येंदु अपनी भूमिका में जमे हैं। तीनों में ऐक्टरों में वह अव्वल हैं। निर्देशक ने कलाकारों के संवादों/लहजे में स्थानीय पुट इतना डाला कि वह एक समय के बाद बनावटी लगता है।

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बेहतर होता कि संवाद खालिस हिंदी ही बने रहने देते। नकलीपन नहीं लगता। फिल्म की कहानी पर्दे पर सुनाई जा रही है और बार-बार ब्लैक-एंड-व्हाइट तथा कलर होती हुई इसकी लंबाई बढ़ती जाती है। पहला हाफ ठंडा है, जबकि दूसरे हिस्से में जरूर अदालती मामले/बहस की वजह से गर्मी आती है। इधर पर्दे पर अमूमन अकेले होते जा रहे हीरो-हीरोइनों के दौर में सुशील, ललिता और त्रिपाठी के परिवार दिखाए गए हैं परंतु इनमें आईं सुप्रिया पिलगांवकर तथा फरीदा जलाल जैसी सीनियर अभिनेत्रियों का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो पाया। फिल्म का गीत-संगीत औसत है। पहाड़ की कुछ लोकेशन जरूर खूबसूरत लगती हैं।

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