मूवी मंगल: सब कुशल मंगल
कलाकार: प्रियांक शर्मा, रीवा किशन, अक्षय खन्ना, सतीश कौशिक, सुप्रिया पाठक और राकेश बेदी।
निर्देशक: करण विश्वनाथ कश्यप
निर्माता: प्राची नितिन मनमोहन
निर्माता नितिन मनमोहन की बेटी प्राची, अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे के बेटे प्रियांक और अभिनेता रवि किशन की बेटी रीवा के साथ मिलकर बंटी और बबली, चक दे इंडिया और डॉन जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक रहे करण विश्वनाथ कश्यप ने बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म बनाई है, सब कुशल मंगल यानी बोले तो ऑल इज वेल। सब कुशल मंगल के साथ साल के पहले शुक्रवार को सनी कौशल और रुखसार की फिल्म भंगड़ा पा ले भी रिलीज हुई है। लेकिन, दोनों फिल्मों का हाल एक जैसा है। ऐसे में जानते हैं कैसी है फिल्म और अमर उजाला ने दिए हैं कितने स्टार्स।
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sab kushal mangal
- फोटो : social media
पहले देखते हैं हाल सब कुशल मंगल का। दहेज के चक्कर में शादियों में रुकावट महसूस करने वालों की मदद करने वाला एक नेता टाइप मवाली है बाबा भंडारी।लोकल न्यूज चैनल का टीवी पत्रकार पप्पू मिश्रा उसे परेशान करता है तो वह उसकी शादी मंदिरा शुक्ला से कराकर बदला लेना चाहता है। मामला उल्टा तब पड़ता है जब पप्पू और मंदिरा के बीच लव स्टोरी शुरू हो जाती है। प्रेम के दो कोण बनते हैं तो बाबा भंडारी इसका त्रिभुज बनाना चाहता है। और, इस खींचतान में फिल्म आयताकार होकर चारों कोनों से फैल जाती है।
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प्रियांक शर्मा और रीवा की तरह करण की भी ये पहली फिल्म है। बिजेंद्र काला के साथ मिलकर उन्होंने फिल्म की पटकथा तो अच्छी गढ़ी पर बतौर निर्देशक वह इसे कागजों पर लिखे अक्षरों जैसा करिश्माई बना नहीं पाए। बिजेंद्र काला ने फिल्म के संवाद भी लिखे हैं। दोनों चीजें करण की मदद करती भी दिखती हैं। फिल्म की चौसर भी वह सही बिछाते हैं लेकिन थोड़ी देर बाद ही फिल्म शतरंज के खेल से निकलकर खो खो बन जाती है। समझ नहीं आता कि क्यों हर कलाकार दूसरे को खो बोल रहा है और दूसरा भी है कि बस भागे जा रहा है।
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निर्देशन में मात खाने के बाद फिल्म मात खाती है अपने लीड कलाकारों में सिनेमाई करिश्मे की कमी के चलते। रीवा किशन के चेहरे पर फिल्म के शुरूआती दृश्यों में ताजगी दिखती है। वह एक अच्छे किरदार की उम्मीद भी बंधाती हैं लेकिन जैसे जैसे कहानी का रायता फैलता है, उनका अभिनय भी बेस्वाद होने लगता है। प्रियांक शर्मा का भी वही हाल है। हीरो जैसा कुछ उनमें दिखता नहीं है। कई बार तो ये भी लगता है कि फिल्म मिल गई है, बस इसीलिए वह कैमरे के सामने एक्टिंग किए जा रहे हैं। ले देकर फिल्म का सारा दारोमदार आ जाता है अक्षय खन्ना पर। अक्षय खन्ना ने हिंदी सिनेमा में कुछ बेहतरीन किरदार किए हैं, पर बाबा भंडारी का किरदार फिल्म को बचा नहीं पाया। सतीश कौशिक और सुप्रिया पाठक ओवर एक्टिंग का शिकार हुए हैं, हां, राकेश बेदी को लय में लौटते देखना सुख देता है।
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फिल्म की चौथी कमजोर कड़ी है इसका तकनीकी पक्ष। सचिन कृष्ण की सिनेमैटोग्राफी कुछ ऐसा रच नहीं पाती जिसे देखने के लिए ही दर्शक सीट पर बिना कममसाए बैठा रहे। प्रशांत सिंह राठौर की एडीटिंग भी कुछ खास प्रभावित नहीं करती। रही सही कसर पूरी कर देता है हर्षित सक्सेना का संगीत। फिल्म का एक भी गाना ऐसा नहीं है जिसे फिल्म देखने के बाद गुनगुनाने का मन करे। कोफ्त होती है जानकर कि गीतकार समीर अंजान भी इन दिनों नया नया लव जैसा लिखने को मजबूर हैं। नए साल के पहले वीकएंड पर अपना मूड ठीक रखना हो तो इस फिल्म की बजाय परिवार के साथ बिताना बेहतर होगा। अमर उजाला मूवी रिव्यू में इस फिल्म को मिलता है एक स्टार।