'एक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल। जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल.....' हिंदी सिनेमा के चंद बेहद आध्यात्मिक और प्रभावशाली गीतों को गाने वाले मुकेश ने हर तरह के गीत गाए। उनके गाए हुए गीतों का एक-एक बोल श्रोताओं के दिल में उतरता है। मुकेश का बचपन से सपना एक गायक बनने का ही था। इसके लिए उन्होंने शुरुआत से ही तैयारियां कीं। उनके पिता के सपने मुकेश को लेकर कुछ और थे लेकिन मुकेश का मन तो गायिकी में ही लगता था। कई तरह के मतभेदों को झेलते हुए मुकेश ने आखिरकार अपने सपने को पूरा किया और आज उन्हें उनके गाए गीतों के लिए दुनिया याद करती है। उनकी पुण्यतिथि के मौके पर आज हम आपको मुकेश की कुछ दिलचस्प और अनसुनी कहानियां सुनाते हैं।
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घर से भागकर मंदिर में की शादी
मुकेश ने मैट्रिक के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी थी और उन्हें गाने का बहुत शौक था। जब वह अपने स्कूल के कार्यक्रम में गाया करते थे तब उनके दोस्त रोशन हारमोनियम बजाते थे। मुकेश एक गायक बनना चाहते थे जबकि उनके पिता जोरावर चंद माथुर चाहते थे कि मुकेश एक सिविल इंजीनियर बनें। मुकेश का रुझान धीरे-धीरे गायिकी में बढ़ रहा था तो वहां से ध्यान हटाने के लिए पिता ने उनकी नौकरी पीडब्ल्यूडी में लगवा दी। यहां से गायिकी का रास्ता मुकेश को थोड़ा कठिन लगा। लेकिन, जब उन्होंने एक अखबार में नए कलाकारों की भर्ती का एक विज्ञापन देखा तो उन्होंने मुंबई जाने का इरादा कर लिया। मुकेश को मुंबई जाकर पांच साल बाद कामयाबी मिली। उसी दौरान उन्हें एक गुजराती व्यापारी की लड़की सरला से प्रेम हो गया। न तो सरला के पिता मुकेश से शादी करवाने के लिए तैयार थे और न ही मुकेश के पिता। इसलिए इन दोनों ने भागने का फैसला किया और मंदिर में अपने चचेरे भाई मोतीलाल की उपस्थिति में शादी कर ली।
पहली नाकामी पर निर्माताओं ने छोड़ा साथ
मुकेश की बहन की शादी थी तो उसमें गाने बजाने का प्रोग्राम चल रहा था। जब लड़के वालों ने थोड़ी जिद की तो मुकेश ने एल के सहगल के कुछ गाने गुनगुना दिए। उस शादी में फिल्मी दुनिया के भी कुछ जाने-माने लोग आए हुए थे। जब उन्होंने मुकेश को गाते हुए सुना तो उन्होंने सोचा कि क्यों न मुकेश को अपनी फिल्म में बतौर हीरो साइन कर लिया जाए। उस समय अभिनेता अभिनय भी करते थे और गाते भी खुद ही थे। इस ऑफर के साथ वह लोग मुकेश के पिता से मिले। उनसे कहा कि आपका बच्चा बहुत हुनरमंद है तो उसे हम का काम देना चाहते हैं। पहले तो मुकेश के पिता को लगा की वह सब कहने की बातें हैं। लेकिन बाद में उन्होंने मुकेश को अपना मुकद्दर आजमाने के लिए उनके साथ भेज दिया। मुकेश ने अपनी पहली फिल्म 'निर्दोष' में गाया और अभिनय किया। वह फिल्म चली नहीं और जिन लोगों ने मुकेश को बुलाया था उन्होंने भी मुकेश का साथ छोड़ दिया। वह कंपनी भी बंद हो गई। बाद में मजबूरी में मुकेश को शेयर दलाली और मेवा बेचने वाले जैसे कोई छोटे-मोटे धंधे करने पड़े।
सुरों को पहचान दिलाने की जद्दोजहद
मुकेश को पहली बार अपने चचेरे भाई मोतीलाल के लिए गाने का मौका फिल्म 'पहली नजर' में मिला। वर्ष 1943 में आई इस फिल्म में मुकेश ने एक गीत गाया। उन्होंने गीत तो गा दिया लेकिन बाद में इस गीत को रिलीज करने के लिए फिल्म के निर्देशक मजहर खान आनाकानी करने लगे। वह कहने लगे कि वह इस गीत को रिलीज नहीं कर सकते। इस बात से मुकेश को थोड़ी हैरानी हुई फिर उन्होंने कहा कि उन्होंने यह गीत एक शानदार अभिनेता के लिए गाया है। इस में दिक्कत क्या है? इस पर मजहर खान ने कहा कि मोतीलाल अक्सर चुलबुले किरदार करते हैं इसलिए उन पर यह दुख भरा गाना जंच नहीं रहा। जब फिल्म के बाकी कलाकारों ने मजहर खान को समझाया तो वह गीत को एक शर्त पर रिलीज करने के लिए तैयार हुए। उन्होंने कहा कि अगर यह गीत सिनेमाघरों में लोगों को पसंद नहीं आया तो एक हफ्ते बाद फिल्म से इस गीत को निकाल देंगे। लेकिन, मुकेश का गाया गाना लोगों को बहुत पसंद आया और वहां से मुकेश की गाड़ी चल पड़ी।
लता मंगेशकर को दिलाया मौका
सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर मुकेश को अपना भाई मानती थीं। सिर्फ मानती ही नहीं थीं, बल्कि वह हर साल उन्हें राखी भी बांधा करती थीं। लता आज भी जब अपने संघर्ष के दिनों को याद करती हैं तब उन्हें सबसे पहले याद आते हैं मुकेश। मुकेश ही वह शख्स थे जिन्होंने लता को अपना करियर बनाने में मदद की थी। वह दौर कुछ ऐसा था जब लता को लोग उनकी पतली आवाज की वजह से पसंद नहीं करते थे। और बहुत सी जगहों से उन्हें नकारा जा चुका था। जब मुकेश ने लता की आवाज पहली बार सुनी तो उन्होंने लता को नौशाद से मिलवाया। मुकेश के कहने पर नौशाद ने फिल्म 'अंदाज' के छह गाने शमशाद बेगम की जगह लता मंगेशकर को गाने को दिए। वहां से लता को भी पहचान मिलना शुरू हो गई।