90 के दशक में कोई हीरो था जो हर किसी पर भारी पड़ता था तो वो थे गोविंदा। गोविंदा के पिता अपने जमाने के एक्टर अरुण कुमार आहूजा थे और मां थीं निर्मला देवी। अरुण कुमार ने 40 के दशक में कोई 30- 40 फिल्मों में काम किया। उनकी मां निर्मला देवी बनारस की रहने वाली बेहद उम्दा शास्त्रीय गायिका थीं जो अपनी ठुमरी के लिए जानी जाती थीं और वहीं उन्होंने कई फिल्मों में गाया भी था।
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गोविंदा
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एक फिल्म के निर्माण में जबरदस्त घाटे के बाद गोविंदा के पिता को अपना बंगला छोड़ मुंबई में विरार आकर रहना पड़ा और यहीं से उन्हें 'विरार का छोकरा' नाम मिला। घर की हालत ज़्यादा अच्छी न थी। गोविंदा कॉमर्स में ग्रेजुएट थे और नौकरी के लिए कई जगह गए लेकिन कुछ बात बन नहीं रही थी। क्योंकि गोविंदा की किस्मत में तो हीरो बनना लिखा था।
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गोविंदा
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गोविंदा को 80 के दशक में पहले एलविन नाम की एक कंपनी का विज्ञापन मिला और जल्द ही 'तन- बदन' फिल्म में हीरो बनने का मौका। हीरोइन थी दक्षिण की खुशबू। फिल्म 'लव 86' से जो उन्हें कामयाबी मिलनी शुरू हुई तो 90 का दशक आते- आते वो इंडस्ट्री में छा गए। 90 के दशक में तीनों खानों के अलावा अगर कोई था जो बॉक्स ऑफिस पर उनका मुकाबला कर रहा था तो वो गोविंदा थे।
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गोविंदा
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गोविंदा की साल में आठ से नौ फिल्में तक रिलीज होती थीं और पैसा भी कमाती थीं। उनकी कमाल की कॉमिक टाइमिंग, खास डायलॉग और पंच लाइन जो उनके लिए ही लिखे जाते थे, उनके रंग बिरंगे चटखदार कपड़े, कमाल का उनका डांस- ये सब काफी थे बॉक्स ऑफिस पर आग लगाने के लिए। न तो वे आमिर खान की तरह चॉकलेटी हीरो थे, न सलमान की तरह उनकी बॉडी थी, न शाहरुख की तरह रोमांटिक इमेज न अक्षय कुमार जैसा एक्शन।
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गोविंदा, रवीना टंडन
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फिर भी गोविंदा का अपना अलग स्वैग था या कहिए उस समय उनका अच्छा वक्त चल रहा था। उनकी कॉमिक टाइमिंग ऐसी थी कि जब 1998 में फिल्म 'बड़े मियाँ छोटे मियाँ' आई तो बहुतों को ऐसा लगा कि एक बार के लिए गोविंदा ने अमिताभ बच्चन तक को पछाड़ दिया है। गोविंदा ही थे जो बे सिर- पैर वाले डायलॉग को भी अपनी खासियत बना लेते थे। जैसे आपको गोविंदा का ये डायलॉग तो याद ही होगा- "दुनिया मेरा घर है, बस स्टैंड मेरा अड्डा, जब मन करे आ जाना, राजू मेरा नाम है और प्यार से मुझे बुलाते हैं कुली नंबर वन।"