44 साल के हो चुके अभिषेक बच्चन इन दिनों अपने हर किरदार को एक चुनौती की तरह ले रहे हैं। वह चाहते हैं कि जब लोग उनकी फिल्में देखने आएं तो उस किरदार की कहानी देखें न कि अभिषेक बच्चन को। वह यह भी मानते हैं कि जीवन में सरनेम से कुछ नहीं होता जो होता है अपनी मेहनत, हिम्मत और हौसले से ही होता है। फिल्म ‘लूडो’ के बाद जल्द ही वह ‘बिग बुल’ और ‘बॉब बिस्वास’ में नजर आने वाले हैं। अमर उजाला के लिए उनसे ये खास बातचीत की पंकज शुक्ल ने।
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अभिषेक बच्चन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपकी कबड्डी टीम जयपुर पिंक पैथर्स की डॉक्यूमेंट्री वाकई कमाल है। कैसे कबड्डी के प्रति आपकी दिलचस्पी जगी?
कबड्डी ऐसा खेल है जिसे हम सबने बचपन में जरूर खेला है। मुझे जैसे ही पहला मौका इस खेल से जुड़ने का मिला, मैंने तुरंत हां कर दी। ये जोश के साथ साथ होश का भी खेल है। खेल हमें वह सब सिखाते हैं जो सिर्फ एक खिलाड़ी या एक कलाकार के लिए ही जरूरी नहीं होते बल्कि हमारे आपके सबके काम आते हैं। ये सबक हैं समर्पण के, ये सबक हैं किसी फैसले को अंतिम चरण तक ले जाने के लिए जुटे रहने के और ये सबक हैं कभी भी हिम्मत न हारने के।
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अभिषेक बच्चन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कभी बचपन में खेलने को लेकर आपकी पिटाई हुई क्या?
कभी नहीं। मेरे माता-पिता शुरू से खेलों को लेकर हमें बहुत उत्साहित करते रहे। मेरा भी ये मानना है कि खेलकूद किसी भी बच्चे के मानसिक विकास के लिए बहुत जरूरी है। खेलना सिर्फ खिलाड़ी बनने के लिए ही नहीं होता, एक अच्छा इंसान बनने के लिए भी खेलों में हिस्सा लेना बहुत जरूरी है। खेल चरित्र निर्माण के लिए भी बहुत जरूरी हैं। मुझे खेलों ने बहुत कुछ सिखाया है। किसी भी सूरत में मैदान नहीं छोड़ने का सबक खेलों से ही मिला है मुझे।
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लूडो में अभिषेक बच्चन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, ये भी कि मुकाबला कैसा भी हो, काम सिर्फ तैयारी ही आती है, सरनेम नहीं?
सिर्फ अभिषेक बच्चन ही क्यों, कोई भी हो। जीवन में संघर्ष तो आपको करना ही पड़ेगा। जिस काम के लिए आपने प्रण लिया है, उसकी तैयारी तो करनी ही पड़ेगी। जैसे मैं कह रहा था तो खेल यहां भी आपको बहुत कुछ सिखाते हैं कि आपने एक योजना के तहत कोई तैयारी की है लेकिन वह काम नहीं आया तो आपको हमेशा प्लान बी तैयार रखना होता है। जीवन भी वैसा ही है।
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अभिषेक बच्चन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभी आपकी एक छवि आपकी निर्माणाधीन फिल्म ‘बॉब बिस्वास’ से सामने आई है, किसी किरदार को निभाने में उसके जैसा ही पर्दे पर दिखना कितना महत्वपूर्ण है?
मेरा हमेशा ये मानना रहा है कि किसी फिल्म में आपका जो किरदार है, अगर आप उसके जैसे ठीक से दिख सके तो आपका आधा काम वहीं हो जाता है। सिनेमा दृश्य श्रव्य माध्यम है। अगर एक कलाकार दिए गए किरदार की तरह ही दिखता है, उसके जैसा ही चलता बोलता और हंसता है तो अभिनय की आधी जीत वहीं हो जाती है। मैंने हमेशा से ये कोशिश की है कि मुझे ऐसे किरदार मिलें जो देखने में बिल्कुल अलग हों।