पिछले कई दिनों में हमारे देश में प्रदूषण को लेकर बहुत शोर मचा है। अक्सर हवा खराब होने और सांस लेना दूभर होने की शिकायतें मिल रही हैं। इस दौरान एक शब्द का इस्तेमाल बार-बार किया जा रहा है, जिसे आप सभी ने सुना ही होगा। वो है PM 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर 2.5)।
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वो चीज जो पीएम 2.5 से कहीं ज्यादा खतरनाक है, प्रदूषण मापने में सरकारें क्यों नहीं लेतीं इनका नाम
Mon, 09 Dec 2019 07:40 AM IST
रत्नप्रिया रत्नप्रिया
बीबीसी
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Published by: रत्नप्रिया रत्नप्रिया
Updated Mon, 09 Dec 2019 07:40 AM IST
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दिल्ली में वायु प्रदूषण (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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File Photo
- फोटो : पीटीआई
- इसमें कोई दो राय नहीं कि पीएम 2.5 और पीएम 10 जानलेवा होते हैं। लेकिन प्रदूषण के जो असल कारक हैं, जिनकी वजह से सबसे ज्यादा मौतें होती हैं, वो कभी सुर्खियों में आते ही नहीं। न ही उनके नियमन के लिए कायदे तय हुए हैं। कुछ वैज्ञानिकों के अलावा, बाकी लोग उनका जिक्र तक नहीं करते।
- वायु प्रदूषण के असल जिम्मेदार हैं - नैनो पार्टिकिल्स। यानी वो छोटे-छोटे कण, जो फेफड़ों से गुजर कर हमारे खून में मिल जाते हैं।
- हां, पीएम 2.5 इतना छोटा है कि हमें दिखता नहीं। क्योंकि ये इंसान के बाल से 30 गुना छोटा होता है। लेकिन, नैनो पार्टिकिल्स से तुलना करेंगे तो ये हाथी और चींटी को बराबर खड़ा करने जैसा होगा।
- पीएम 2.5 असल में 2500 नैनोमीटर आकार का होता है। इसके मुकाबले नैनो पार्टिकिल्स केवल 100 नैनोमीटर आकार के होते हैं।
- पीएम 2.5 से फेफड़ों और सांस की तमाम बीमारियां होती हैं। लेकिन, नैनो पार्टिकिल्स हमारे शरीर के दूसरे अंगों तक पहुंच कर उन्हें तबाह कर सकते हैं।
फिर, नैनो पार्टिकिल्स की गणना क्यों नहीं?
School Childern Pollution Mask
- फोटो : Social Media
- क्योंकि, सरकारें अक्सर PM 2.5 के घनत्व के आधार पर ही प्रदूषण को मापती हैं। तो, नैनोपार्टिकिल्स इस जांच के दायरे में ही नहीं आते। जबकि ये दसियों लाख कण आराम से एक PM 2.5 के कण के दायरे में समा सकते हैं। लेकिन, उनका जिक्र तक नहीं होता।
- वहीं, वैज्ञानिक कहते हैं कि हमें PM 2.5 के साथ-साथ नैनो पार्टिकिल्स को लेकर भी जागरूक होना चाहिए। लोगों को केवल प्रदूषण के कण के आकार पर ही नहीं, हमारी सांस के साथ कितने कण भीतर जाते हैं, उनकी संख्या पर भी गौर करने की जरूरत है।
- नैनो पार्टिकिल्स के खतरों के बारे में सबसे पहले 2003 में सर्बजीत कौर ने आवाज उठाई थी। उस वक्त सर्बजीत कौर, लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में युवा रिसर्चर थीं। वो लंदन की हवा में प्रदूषण की पैमाइश के लिए हो रहे डैपल एक्सपेरिमेंट का हिस्सा थीं।
जब भाारतीय शोधकर्ता के प्रयोग में हुए चौंकाने वाले खुलासे...
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प्रदूषण का धुंध (File)
- फोटो : एएनआई
- डैपल यानी (Dispersion of Air Pollution and its Penetration into the Local Environment)। सर्बजीत कौर ने कुछ स्वयंसेवियों के साथ-साथ खुद भी इस प्रदूषण का तजुर्बा किया था।
- इसके तहत 6 लोगों को क्रिसमस के पेड़ जैसी वेष-भूषा में केंद्रीय लंदन की कुछ व्यस्त सड़कों से गुजरने को कहा गया था। इनके लिबास में प्रदूषण मापने वाले उच्च तकनीक के यंत्र लगे थे।
- इन लोगों के शरीर पर लगे उपकरणों से वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक PM 2.5, कार्बन मोनो ऑक्साइड को मापा गया। साथ ही साथ, सर्बजीत कौर ने एक नया उपकरण भी लगाया था। ये यंत्र हवा में मौजूद नैनो पार्टिकिल्स का आंकलन भी करता था। ये मशीन 2 नैनोमीटर तक के छोटे कणों को भी पकड़ सकती थी, जो इंसान के खून की कोशिकाओं से भी काफी छोटे होते हैं।
रिसर्च में क्या पाया?
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File Photo
- फोटो : अमर उजाला
- यूं तो नैनो पार्टिकिल्स के बारे में अमेरिका की रोचेस्टर यूनिवर्सिटी ने भी रिसर्च की थी। लेकिन, सर्बजीत कौर पहली रिसर्चर थीं, जिन्होंने इन बेहद महीन कणों से होने वाले नुकसान का अध्ययन इतने बड़े पैमाने पर किया था।
- सर्बजीत कौर के रिसर्च में पता चला कि जब भी कोई कार, उनकी टोली के आस-पास से गुजरती थी, तो उससे हवा में PM 2.5 की तादाद में तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन इससे नैनो पार्टिकिल्स की तादाद में बेहिसाब इजाफा हो जाता था। इनकी तादाद 36 हजार कणों से लेकर एक लाख तीस हजार तक होती थी।
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- वहीं, पैदल के बजाय जब सर्बजीत के स्वयंसेवी साइकिल से सड़क पर गुजरते थे, तो उनका सामना करीब बीस हजार नैनो पार्टिकिल्स से ही होता था।
- लेकिन, रिसर्च के दौरान एक चौंकाने वाली बात सामने आई। वो ये कि जब लोग कार के भीतर होते थे, तब उन पर नैनो पार्टिकिल्स का हमला सबसे ज्यादा होता था।
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