चंद्रयान 2 (Chandrayaan 2) के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO - Indian Space Research Organisation) ने चार शब्द कहे थे, जिसे सुनकर हर कोई थोड़ा सहम गया था। ये शब्द थे - '15 Minutes of Terror' यानी 'खौफ के 15 मिनट'।
Chandrayaan 2: इसरो ने पहली बार नहीं कहा है 'खौफ के 15 मिनट', जानें कहां से आए ये शब्द
- चंद्रयान 2 की लॉन्चिंग के समय इसरो प्रमुख ने कहा था - 'खौफ के 15 मिनट'
- पहली बार इसरो में नहीं हुआ है इन शब्दों का प्रयोग
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पहले हम आपको वो बातें याद दिला रहे हैं जिस कारण चंद्रयान 2 के मामले में ये शब्द कहे गए।
दरअसल, जब चंद्रयान 2 लॉन्च होने वाला था, तभी इसरो प्रमुख डॉ. के. सिवन ने कहा था कि विक्रम लैंडर के चांद पर उतरने में जो अंतिम 15 मिनट लगेंगे, वे बेहद मुश्किल होंगे। अगर इन 15 मिनट में सब सही रहा, तो हम इतिहास रच देंगे। क्योंकि ये प्रक्रिया काफी जटिल है, इसलिए इस दौरान किसी भी अनहोनी की आशंका है। ये खौफ के 15 मिनट (15 Minutes of Terror) होंगे। आखिर के पलों में इसरो प्रमुख की ये आशंका सही साबित हो गई।
अब आपको बताते हैं कि ये शब्द आए कहां से?
चंद्रयान 2 की लॉन्चिंग से करीब आठ साल पहले, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने एक क्यूरियॉसिटी लैंडर लॉन्च किया था। नवंबर 2011 में इसे मंगल ग्रह पर पहुंचाने के लिए लॉन्च किया गया था। लॉन्चिंग के करीब 10 महीने बाद, यानी 6 अगस्त 2012 को नासा के क्यूरियॉसिटी को मंगल ग्रह की सतह पर उतरना था। मंगल की कक्षा (orbit) में प्रवेश करने से लेकर उसकी सतह पर उतरने में इसे करीब 7 मिनट का समय लगना था। ये प्रक्रिया काफी जटिल थी। आगे पढ़ें फिर क्या हुआ था?
क्यूरियॉसिटी को लैंड कराने का पूरा कमांड नासा के जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी (JPL) के हाथ में था। चंद्रयान 2 की तरह ही क्यूरियॉसिटी का प्रोग्रामिंग भी पूरी तरह ऑटोमेटिक थी। जेपीएल इसकी सिर्फ निगरानी कर सकता था।
क्यूरियोसिटी एक छोटे आकार का रोवर था, जिसे एक हीट शील्ड से कवर कर सुरक्षित किया गया था। यह रोवर छोटी कार की तरह दिखता था। इसे मंगल की सतह पर उतने में जो 7 मिनट लगने थे वो भी चंद्रयान 2 के इन 15 मिनट की तरह ही थे। तभी जेपीएल के वैज्ञानिकों ने इसे 'खौफ के 7 मिनट' (7 Minutes of Terror) का नाम दिया था। इसरो के पूर्व वैज्ञानिक और आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर तपन मिश्रा ने भी अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस बात का जिक्र किया है। हालांकि यह अंग्रेजी का फ्रेज है जिसका इस्तेमाल कहीं भी किया जा सकता है। लेकिन विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में सार्वजनिक रूप से इसका इस्तेमाल तभी पहली बार किया गया था। आगे पढ़ें, क्या क्यूरियॉसिटी सुरक्षित उतर पाया?
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