विश्व विटिलिगो दिवस विशेष : दिमागी तौर पर भी बीमार बना देता है सफेद दाग, सुसाइड के भी आते हैं विचार
इतना ही नहीं मरीज का परिवार भी समाज की भ्रांतियों में पड़कर परेशान होता है। बता दें कि सफेद दाग की बीमारी को लेकर लंबे समय से एक लड़ाई चल रही है। भारतीय सैन्य सेवाओं से लेकर कई तरह की सरकारी नौकरी में भी सफेद दाग की वजह से मौका नहीं मिल पाता। बीते वर्ष डीआरडीओ ने ल्यूकोस्किन नामक दवा बनाकर सफेद दाग से लोगों को राहत दिलाने में मदद की। अब एम्स के डॉक्टर भी इस पर काम कर रहे हैं।
न छुआछूत न कुष्ठ है सफेद दाग विश्व विटिलिगो दिवस पर शुक्रवार को एम्स के डर्मिटोलॉजी विभाग के डॉ. सोमेश गुप्ता ने बताया कि जब इंसान के शरीर में रंग बनाने वाले सेल विपरीत अवस्था में कार्य करने लगते हैं तो त्वचा पर सफेद दाग दिखाई देने लगते हैं। लेकिन वर्षों पहले इसे श्वेत कुष्ठ माना जाता था। लोगों ने इसे कुष्ठ मान कर मरीज से दूरी बनाना शुरू कर दिया। जबकि यह गलत है। सफेद दाग छुआछूत की बीमारी नहीं है और न ही ये किसी तरह का कुष्ठ है। अगर मरीज जल्दी अस्पताल पहुंचता है तो उसका उपचार हो सकता है।
हर माह 300 से ज्यादा मरीज डॉ. सोमेश गुप्ता ने बताया कि एम्स में हर माह करीब 300 मरीज सफेद दाग का इलाज कराने पहुंचते हैं। इनमें से तीन से चार मरीजों का हर सप्ताह ऑपरेशन किया जाता है। आमतौर पर एम्स में विटिलिगो सर्जरी की वेटिंग छह माह तक की है। स्टडी में एम्स के डॉक्टरों ने पाया है कि सफेद दाग का मरीज दिमागी तौर पर काफी परेशान हो जाता है। उसे खुद से नफरत सी होने लगती है।
भारत में ज्यादा हैं मरीज दिल्ली सरकार के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. रश्मी सरकार का कहना है कि भारत में सफेद दाग के मरीज अत्यधिक हैं। दुनिया में कुल आबादी का करीब एक फीसदी हिस्सा इससे ग्रस्त है। जबकि अपने देश में यह आंकड़ा आबादी की 8.8 फीसदी है।