आज देशभर के साथ ही दिल्ली-एनसीआर में पूरे हर्षोल्लास से बकरीद का त्योहार मनाया जा रहा है। इस मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद समेत अन्य मस्जिदों में भी ईद-उल-जुहा(बकरीद) की नमाज पढ़ी गई। इस मौके पर बीजेपी के नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने भी बकरीद की नमाज अदा की। आगे की स्लाइड्स में पढ़िए आखिर क्यों आज के दिन दी जाती है कुर्बानी और लोगों ने कैसे मनाई बकरीद...
ईद-उल-जुहा यानि बकरीद का त्योहार केवल बकरों की कुर्बानी देने का ही नाम नहीं हैं बल्कि कुर्बानी का मकसद है अल्लाह को राजी करने के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज को भी त्याग कर देना है। इसी दिन दुनिया भर के मुसलमान अरब पहुंच कर हज करते हैं। हज की वजह से भी इस पवित्र त्योहार की अहमियत बढ़ जाती है।
अल्लाह को राजी करने के लिए जानवरों की कुर्बानी देना तो जरिया है जबकि अल्लाह को कुर्बानी का गोश्त नहीं पहुंचता है, वह तो केवल कुर्बानी के पीछे बंदों की नीयत को देखता है। अल्लाह को पसंद है कि बंदा उसकी राह में अपना हलाल तरीके से कमाया हुआ धन खर्च करे। कुर्बानी का सिलसिला ईद के दिन को मिलाकर तीन दिनों तक चलता है।
क्या है कुर्बानी का इतिहास- इसलाम धर्म में इब्राहीम नाम के एक पैगंबर गुजरे हैं, जो मुहम्मद साहब से हजारों साल पहले पैदा हुऐ थे। जिन्हें ख्वाब में अल्लाह का हुक्म हुआ कि वे अपनी सबसे प्यारी चीज को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। अल्लाह को राजी करने के लिए इब्राहीम ने बकरे से लेकर ऊंट तक की कुर्बानी दी लेकिन अल्लाह ने हर बार ख्वाब में सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने का हुक्म दिया।
अंत में इब्राहीम को लगा कि उसका बेटा बेटे इस्माईल (जो बाद में पैगंबर हुए) ही सबसे प्यारा है। अल्लाह उसी की ही कुर्बानी मांग रहा है। यह इब्राहीम अलैही सलाम के लिए एक इंतिहान था, जिसमें एक तरफ थी अपने बेटे से मुहब्बत और एक तरफ था अल्लाह का हुक्म। इब्राहीम अलैही सलाम ने अल्लाह के हुक्म को पूरा करने के लिए अपने बेटे इस्माईल नबी की कुर्बानी देने को तैयार हो गए।