शहर में सूखा नशा (चरस, गांजा, भांग, स्मैक) इस कदर खुलेआम बिकता है कि दिनभर शहर के विभिन्न पार्कों, नाहर सिंह स्टेडियम के पीछे, रोजगार्डन सहित सुनसान स्थानों पर सुट्टे लगते रहते हैं। 50 से 100 रुपये में नशे की पुड़िया किसी भी स्लम बस्ती से बिना किसी रोकटोक के खरीदी जा सकती है। दिल्ली से भी युवा यहां नशा लेने के लिए आते हैं। उधर, पुलिस सब कुछ जानकार भी अनजान बनी रहती है।
फरीदाबाद: खुलेआम चल रहा है नशे का करोबार, कोड वर्ड बताओ और नशा ले जाओ
होमवर्क नहीं, बच्चों का बैग चेक करें
पिछले कुछ समय से शहर में नशे के सौदागरों ने कॉलेज यूनिवर्सिटी के बाद अब स्कूली बच्चों को भी अपने टारगेट पर ले लिया है। शुरू में वे उन्हें चरस-गांजा भरी सिगरेट पीने की लत लगाते हैं। एक बार लत लगने के बाद बच्चा खुद ब खुद उस सिगरेट की तलाश करने लगता है। मनोविशेषज्ञ डा. अजय भार्गव का कहना है कि यदि आपका बच्चा चिड़चिड़ा रहने लगे, परिवार वालों से अलग बैठने लगे, उसे भूख न लगे, पढ़ाई में कमजोर होता जाए, तो परिजनों को उसका होमवर्क चेक करने से ज्यादा बैग चेक करने की जरूरत है कि कहीं उसमें नशीला पदार्थ या नशा करने का कोई सामान तो नहीं है।
कोर्डवर्ड से मिलता है माल
शहर में सेक्टर-22 मछली मार्केट, ऑटोपिन झुग्गी, एसी नगर, राहुल कॉलोनी, कल्याणपुरी बस्ती, नेहरू कॉलोनी, संत नगर, बाईपास रोड सेक्टर-18 बस्ती सहित शहर में ऐसे दर्जनों ठिकाने हैं, जहां खुलेआम सूखा नशा बेचा जा रहा है। नशेड़ियों को सप्लायर जानते हैं और सप्लायरों को नशेड़ी। ऐसे में अगर कोई नया ग्राहक आता है तो उसे बिना कोर्ड वर्ड के सामान नहीं मिलता है। स्टेडियम के पीछे गांजे का नशा कर रहे कुछ युवकों ने बताया कि सीधे जाकर मांगने पर कुछ नहीं मिलेगा, आपको कोर्ड वर्ड बताना होगा। उन युवकों के अनुसार किसी भी ठिकाने पर जाकर इतना कह दें कि माल या पुड़िया चाहिए तो सप्लायर आपको गांजे की पुडिय़ा लेकर दे देगा।
पान की दुकान पर बिकता है विशेष कागज
सूखे नशे को सिगरेट में भरे तंबाकू के साथ मिलाकर युवक उसका सेवन करते हैं। इन्हें दोबारा भरने के लिए पनवाड़ियों की दुकानों पर विशेष तरह का कागज उपलब्ध है। सिगरेट की तरह फिल्टर लगे इस कागज की कीमत 10 रुपये है तो प्लेन पेपर 5 रुपये में मिल जाता है। कैप्टन गोगो के नाम से मशहूर यह विशेष कागज शहर के ज्यादातर पान की दुकान पर है। पिछले दिनों पुलिस ने इस पर इक्का-दुक्का कार्रवाई भी की, मगर हालात अब फिर से ढाक के तीन पात जैसे हैं।