उत्तर प्रदेश के एक गांव से अपने सपनों और मम्मी-पापा की उम्मीदों को पूरा करने के लिए मैं 23 साल की उम्र में देश की राजधानी दिल्ली आई थी। पैरामेडिकल में दाखिला लिया। मन में जीवन की जंग जीतने को हर तकलीफ पार करने का जज्बा था। पर मैं हार गई। हारी भी तो किससे... जिंदगी से नहीं। बल्कि हैवानियत से। चलती बस में जघन्य अपराध का शिकार हुई। ऐसी क्रूरता कि मेरी आंतें तक बाहर आ गईं। ऐसे जख्म मिले मेरी रूह तक से भी खून की बूंदें टपकती हैं।
मैं निर्भया बोल रही हूं..."हैवानियत ने मेरे सपने कुचल दिए, इंसाफ के इंतजार में बिलख रही है मेरी रूह"
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और जैसे यह काफी नहीं था, तो मुझे न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे मेरे मां-पापा अब न्यायिक और कानूनी पेचीदगियों की हैवानियत के शिकार बन रहे हैं।
कौन हूं मैं, क्या आपको याद है?
भले ही मैं आपलोगों के बीच नहीं, लेकिन आज भी रोज अन्याय का जहर पी रही हूं। अरे, आपलोग तो मुझे भूल गए होंगे। मैं निर्भया हूं। आप ही लोगों ने तो मुझे यह नाम दिया था। वही निर्भया जिसके साथ छह लोगों ने 16 दिसंबर 2012, रविवार की रात चलती बस में हैवानियत की थी।
आंखों से आंसू गिर रहे हैं। गला भरा है। आवाज नहीं निकल रही। फिर भी मैं आपके लिए उस भयावह काली रात को दोहराती हूं। दोस्त के साथ उस रात फिल्म देखने के बाद मुनिरका से द्वारका जाने वाली बस में बैठी थी। बस में हम दोनों के अलावा छह लोग थे। कुछ समझ पाते इससे पहले ही सभी ने मेरे साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी। दोस्त ने बीच-बचाव किया तो उसे बुरी तरह पीट-पीटकर बेहोश कर दिया। मैं चीखती रही, चिल्लाती रही। बहुत हाथ पैर जोड़े पर दरिंदों को मुझपर तरस नहीं आई। सभी ने मेरे साथ वो सबकुछ किया जो एक जल्लाद या कसाई भी किसी के साथ करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। उन्होंने पीट-पीटकर मेरे साथ दुष्कर्म किया।
शरीर में लोहे का सरिया घुसा दिया। फिर मरा हुआ समझ कर निर्वस्त्र ही चलती बस से बाहर फेंक दिया। उन जख्मों के आंसू मेरी आंखों से आज भी गिरते हैं। रूह उस खौफनाक रात को याद कर आज भी तड़पती है। पुलिस ने मुझे सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने पांच बार ऑपरेशन किया। आंत का अधिकतर हिस्सा बाहर निकाल दिया। जख्म इतने गहरे थे कि मेरी हालत बिगड़ती चली गई। 26 दिसंबर को सरकार ने मुझे इलाज के लिए सिंगापुर भेज दिया। सबको पता था मैं बच नहीं सकती। मैं सभी के लिए मुद्दा बन गई। सब अपनी साख बचाने में लगे थे। आखिरकार वही हुआ जो सब जानते थे। मैं बच नहीं सकी। 29 दिसंबर की रात करीब सवा दो बजे मैंने सिंगापुर के अस्पताल में दम तोड़ दिया। फिर मुझे गम और गुस्से के साथ पंचतत्व में विलीन कर दिया गया।
मेरे साथ हुई हैवानियत पर पूरे देश में गुस्सा था। सब 'तत्काल न्याय और सजा' देने की मांग कर रहे थे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। क्यों? क्योंकि कानून की किताबों में इसका प्रावधान ही नहीं था। घटना के कुछ दिन बाद पुलिस ने सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। एक (राम सिंह) ने तो जेल में आत्महत्या कर ली। एक नाबालिग होने के आधार पर बच गया। और आज सात साल बाद भी मुझे मौत की नींद सुलाने वाले बाकी चार दरिंदे तिहाड़ में मटन खा रहे हैं और यहां न्याय के इंतजार में मेरी आत्मा अब भी बिलख रही है। मेरे साथ हैवानियत करने वालों में से चार मुकेश सिंह, पवन गुप्ता, अक्षय ठाकुर और विनय शर्मा को फस्ट ट्रैक कोर्ट ने 13 सिंतबर 2013 को फांसी की सजा सुनाई थी।