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निर्भया कांड की डॉक्यूमेंट्री से उठा एक गंभीर सवाल
Tue, 10 Mar 2015 04:22 PM IST
Updated Tue, 10 Mar 2015 04:22 PM IST
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निर्भया कांड की डॉक्यूमेंट्री से उठा एक गंभीर सवाल
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डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'इंडियाज़ डॉटर' ने असहज सवालों की एक लंबी फेहरिस्त सामने लाकर रख दी है। यह डॉक्यूमेंट्री यौन अपराधों के सिलसिले में दोषी करार दिए गए अपराधियों की यौन विकृतियों और सोच पर रोशनी डालती है। बहस शुरू हो गई है और लोग इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं कि इस फ़िल्म को दिखाने का क्या यह सही समय था। महिलाओं की सुरक्षा के सवाल पर इससे भारत की साख पर क्या असर पड़ेगा? लेकिन यौन अपराध एक मानसिक बीमारी भी है। ऐसे में क्या भारत के मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक-2013 में मनोविकृत यौन अपराधियों के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं? (साभारः द्रोण शर्मा/मनोचिकित्सक, बीबीसी हिंदी)
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जब यौन हिंसा दुनिया भर में सभी संस्कृतियों में होती है, तो क्या भारत को ही इसके लिए चिन्हित किया जाना चाहिए था? यह डॉक्यूमेंट्री यौन अपराधों के मानसिक स्वास्थ्य वाले पहलू को न के बराबर ही छूती है- मसलन अपराध करने वाला एक आदमी स्टिरॉइड या ऐसी ही किसी दवा के इंजेक्शन के ज़रिए अपनी बॉडी बनाना चाहता है जिससे उसके भीतर हिंसा पनपने के आसार और उसकी यौन इच्छाएं विकृतियों का रूप लेने के आसार ज़्यादा हो सकते हैं।
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'असामाजिक व्यवहार'
बलात्कार करने वाले व्यक्ति की हिंसा को ड्रग और अल्कोहल के ख़राब असर के संदर्भ में भी देखे जाने की ज़रू़रत है. जैसे इस मामले में एक दोषी व्यक्ति ने खुदकुशी कर ली थी। इस मामले में बलात्कारी के 'असामाजिक व्यवहार की समस्या' की पड़ताल करने की महज़ बात भर की गई थी। और चिंताजनक रूप से किशोर बलात्कारी को समाज में फिर से लौटने दे दिया जाएगा। ऐसे में उसके फिर से अपराध करने के खतरे को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है।
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कानूनी उपाय
इसमें कोई शक़ नहीं कि समाज की सोच में बदलाव से हालात बदलेंगे लेकिन ऐसा होने में एक उम्र गुज़र जाएगी। इस बात को लेकर गहरी फिक्र होती है कि भारत में आज यौन अपराधियों से निपटने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली के अलावा किसी और ज़रिए की गुंजाइश बहुत कम ही है, जैसा इस मामले में हुआ। जहां ऐसे दूसरे उपाय हैं वहाँ भी ऐसा कोई कानूनी उपाय नहीं है जिससे अपराध करने वाले व्यक्ति को दिमागी इलाज या अन्य किसी तरह से सहायता लेने के लिए बाध्य किया जा सके।
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यौन अपराध
यह सवाल तो उठता ही है कि केवल जेल भेज देने भर से समाज को यौन अपराधियों से किस तरह से सुरक्षित बनाया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय शोध से पता चलता है कि जरूरी मानसिक इलाज की सुविधा मुहैया कराने से यौन अपराधियों के इस तरह के अपराध दोबारा करने के आसार को 27 फीसदी तक कम किया जा सकता है। सामान्य अपराधों के मामले में भी इलाज से कमी आती है।
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