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शाम होते ही सड़क पर होती हैं ये लड़कियां, कह रहीं ‘पिंजरा तोड़’

Thu, 15 Oct 2015 04:56 PM IST
गीता पांडे / बीबीसी संवाददाता
गीता पांडे / बीबीसी संवाददाता Updated Thu, 15 Oct 2015 04:56 PM IST
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शाम होते ही सड़क पर होती हैं ये लड़कियां, कह रहीं ‘पिंजरा तोड़’

If Cinderella can stay out until midnight, then we why do not.

दिल्ली विश्वविद्यालय के वीमेंस हॉस्टल में ‘पिंजरा तोड़’ नामक एक अभियान जोर पकड़ रहा है। यह अभियान हॉस्टल में रहने वाली छात्राएं चला रही हैं, जो छात्राओं पर तरह तरह की लागू की जाने वाली पाबंदियों का विरोध कर रही हैं। जैसे ही शाम ढलती है क़रीब 60 की संख्या में छात्राएं और छात्र विश्वविद्यालय के कुछ अग्रणी कॉलेजों की ओर कूच कर जाते हैं।

शाम होते ही सड़क पर होती हैं ये लड़कियां, कह रहीं ‘पिंजरा तोड़’

If Cinderella can stay out until midnight, then we why do not.

इनमें से अधिकांश के हाथ में पोस्टर होता है और वो नारे लगाते हुए वीमेंस हॉस्टल के बाहर इकट्ठा हो जाते हैं, वहां कविताएं पढ़ते हैं और इस बीच कुछ नाचने भी लगते हैं। लड़कियां गाती हैं, “हमें इन झूठी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं, तुम आधे देश को पिंजड़े में नहीं कैद कर सकते।”

शाम होते ही सड़क पर होती हैं ये लड़कियां, कह रहीं ‘पिंजरा तोड़’

If Cinderella can stay out until midnight, then we why do not.

एक नौजवान अपने गले में ड्रम लटकाए बजाता है और एक लाल साड़ी पहने एक युवती जोशीला भाषण देती है। इन सबके बीच समूह में शामिल पूर्व और वर्तमान स्टूडेंट्स सीटी और ताली बजाते हैं या ‘शेम शेम’ के नारे लगाते हैं। ये सभी, वीमेंस हॉस्टलों में लागू होने वाले ‘कर्फ्यू’ के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरे हैं।

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शाम होते ही सड़क पर होती हैं ये लड़कियां, कह रहीं ‘पिंजरा तोड़’

If Cinderella can stay out until midnight, then we why do not.

असल में इन हॉस्टलों में रहने वाली छात्राओं को एक निश्चित समय के अंदर ही वापस लौटना होता है। पिंजरा तोड़ अभियान की शुरुआत करने वालों में से एक 26 वर्षीय देवांगना कलिता कहती हैं, “यह भेदभाद वाला रवैया है।”रिसर्च करने वाली कलिता के मुताबिक, “हिफाजत और सुरक्षा मुहैया कराने के नाम पर कर्फ्यू और समय निर्धारित करना असल में पितृसत्ता को लागू करने का तंत्र है।

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शाम होते ही सड़क पर होती हैं ये लड़कियां, कह रहीं ‘पिंजरा तोड़’

If Cinderella can stay out until midnight, then we why do not.

हम कह रहे हैं कि यह महिलाओं की सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि नैतिक पहरेदारी है।”छात्राओं का कहना है कि अधिकांश महिला हॉस्टलों में एक किस्म का ‘कर्फ्यू’ लागू किया जाता है, चाहे वो सरकारी हो या निजी हो। इनमें से कुछ तो शाम 6.30 या 7.30 बजे ही गेट पर ताला लगा देते हैं जबकि कुछ छात्राओं को कुछ और देर तक बाहर रहने की इजाजत देते हैं।

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