बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए मां-बाप क्या कुछ नहीं करते। जब बात
चैंपियन बने बेटी, इसलिए मां-बाप ने दिया 'अनोखा' बलिदान
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चैंपियन बने बेटी, इसलिए मां-बाप ने दिया 'अनोखा' बलिदान
यही नहीं पत्नी ने लंगोट सिले और पिता ने उन्हें पहलवानों को जाकर बेचा। बेटी ने भी पिता का साथ बखूबी निभाया। घर का सहारा बनने के लिए उसने दंगलों में लड़कों से न सिर्फ लोहा लिया बल्कि उन्हें हराया भी। बदले में जो पुरस्कार राशि मिली उससे घर चलाने में मदद मिली।
चैंपियन बने बेटी, इसलिए मां-बाप ने दिया 'अनोखा' बलिदान
पिता सूरज का यह त्याग और बेटी दिव्या की मेहनत उस वक्त रंग लाई जब उसने केडी जाधव स्टेडियम में रविवार को एशियाई कैडेट कुश्ती चैंपियनशिप का गोल्ड अपने नाम किया। वैसे तो सूरज मुजफ्फरनगर (यूपी) के रहने वाले हैं लेकिन 15 साल पहले वह दिल्ली आ गए, लेकिन आज भी किराए के मकान में रहते हैं। खुद बड़े पहलवान नहीं बन पाए तो दोनों बेटों को इस खेल में उतार दिया। पिता का शौक और भाइयों को कुश्ती लड़ते देख दिव्या ने भी आठ साल की उम्र में पहलवानी शुरू कर दी।
चैंपियन बने बेटी, इसलिए मां-बाप ने दिया 'अनोखा' बलिदान
सूरज बताते हैं कि दिव्या होनहार थी, लेकिन उनके पास इतना पैसा नहीं था कि तीनों को यह खेल जारी रखवाते। नतीजतन दोनों लड़कों की पहलवानी छुड़वा दी, लेकिन वह बेटी को कहीं अकेला नहीं छोड़ते हैं। उसका चयन लखनऊ नेशनल कैंप के लिए हुआ। भाई बाहर किराए पर रहकर उसकी देखभाल करता है। किसी भी कंपटीशन में भाई ही साथ जाते हैं। नेशनल गेम्स में कोच्चि जाने के लिए एक लाख रुपये की जरूरत थी। उन्हें मजबूरन पत्नी का मंगलसूत्र, कुंडल व अन्य गहने गिरवी रखने पड़े। मंगलसूत्र तो दिव्या ने दंगल जीतकर छुड़वा लिया लेकिन अन्य गहने अभी भी गिरवी हैं।
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दिव्या मिट्टी के दंगल लड़ती है जो मैट कुश्ती के लिए खतरनाक हैं। वह अब तक 40 दंगलों में पदक जीत चुकी है। पिता कहते हैं कि घर का सहारा बनने के लिए वह ऐसा कर रही है। यही नहीं आठ दिन पहले उसके कोच प्रेमनाथ का निधन हो गया और कुछ दिन पहले नाना का। नाना से लगाव था, लेकिन अभी तक उसे इस बारे में नहीं बताया है। सूरज कहते हैं कि शायद यह गोल्ड मेडल उनकी बेटी की किस्मत बदल देगा।