गर्मी बढ़ने के साथ ही अब जंगलों में आग ने भी विकराल रूप ले लिया है। अब ये आग बस्तियों तक पहुंचने लगी है। टिहरी के जंगलों में आग लगने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। भिलंगना, बालगंगा, पौखाल, टिहरी और प्रतापनगर रेंज के जंगल आग से धधक रहे है। टिहरी जिले में नरेंद्रनगर, मसूरी, टिहरी डैम वन प्रभाग और टिहरी वन प्रभाग के अंतर्गत इस वर्ष अब तक अग्निकांड की 55 घटनाएं हो चुकी है। जिससे 67 हेक्टेयर वन भूमि क्षेत्र में आग लगने से लाखों की वन संपदा को नुकसान पहुंचा है।
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उत्तराखंड के जंगलों में आग
- फोटो : अमर उजाला
जंगल में आग लगने से चीड़ के साथ ही बांज, बुरांश, देवदार के पेड़ों को नुकसान पहुंचा है। हालांकि वनाग्नि पर नियंत्रण पाने के लिए वन विभाग ने अलग-अलग क्षेत्रों में 133 क्रू स्टेशन, 336 फायर वाचर, 815 वन रक्षक, वन दरोगा, दैनिक श्रमिक और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की तैनाती की है। बावजूद इसके वनाग्नि पर नियंत्रण पाने में वन महकमा नाकाम साबित हो रहा है।
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चार दिनों से चमोली जिले के जंगलों में आग लगने से करीब 10 लाख रुपये की वन संपदा राख हो गई है, वहीं पिछले सात वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 1.10 करोड़ से अधिक की वन संपदा को नुकसान पहुंचा है। आग से दुर्लभ प्रजाति के जानवर और पक्षियों के जीवन को भी खतरा बना है। चमोली जिले के एंड, डिम्मर, जेकिंडी, कालेश्वर, सिरतोली, बेरफाला, घाघू, मौणा, उमट्टा, मैठाणा, गोपथला, रैंखाल के जंगलों में वन एवं वन्य जीवों को भारी नुकसान पहुंचा है।
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उत्तराखंड के जंगलों में आग
जंगलों में आग बुझने के बाद चारों तरफ धुएं का गुबार बना है, जो जन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बना हुआ है। कर्णप्रयाग में उमा देवी मंदिर में आए बुजुर्ग यात्रियों ने बताया कि उनको धुएं में सांस लेने में तकलीफ हो रही है। कालेश्वर के ग्राम प्रधान समेत कई लोगों ने कहा कि वन विभाग के पास आग बुझाने के पर्याप्त साधन नहीं होने से हर वर्ष भारी वन संपदा आग की भेंट चढ़ जाती है। जंगलों में आग लगने से घुरूड़, काकड़ सहित अन्य दुर्लभ प्रजाति के जंगली जानवरों को भी खतरा पैदा हो गया है।
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लैंसडौन वन प्रभाग की पांच रेंजों में वनाग्नि से निपटने के लिए 64 क्रू स्टेशन बनाए गए हैं। इन दिनों बढ़ते तापमान के कारण वन प्रभाग के कोटद्वार रेंज, लैंसडौन रेंज, कोटड़ी रेंज और दुगड्डा रेंज में आग सुलगनी शुरू हो गई है, लेकिन वन कर्मियों के पास अग्नि सुरक्षा के संसाधन नहीं होने के कारण उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।