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Uttarkashi Cloudburst: बादल फटने से नहीं आई धराली में इतनी भयानक आपदा, वैज्ञानिकों ने बताई असली वजह

Thu, 07 Aug 2025 10:55 AM IST
रेनू सकलानी राजेश एस. राठौर
राजेश एस. राठौर Published by: रेनू सकलानी Updated Thu, 07 Aug 2025 10:55 AM IST
सार

धराली में आई आपदा को लेकर वैज्ञानिकों ने अपने तर्क दिए हैं। धराली के पीछे डेढ़-दो किलोमीटर लंबा और बेहद घना जंगल है। जिस खीर गाड से फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) आया वो उन्हीं जंगलों से होकर गुजरता है।

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Uttarkashi Cloudburst Reason disaster in Dharali was not caused by cloudburst scientists Says Uttarakhand
उत्तरकाशी खीरगंगा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में मंगलवार को आई भयानक आपदा की वजह बादल फटना नहीं है। क्योंकि मौसम विभाग के मुताबिक 4-5 अगस्त को वहां पर 8 से 10 मिमी ही बारिश हुई जबकि बादल फटने के समय 100 मिमी से ज्यादा बारिश होती है। यह कहना है वैज्ञानिकों का। उनका कहना है कि इसकी वजह भूस्खलन से पानी का प्रवाह रुकने से अस्थाई झील बनना, पर्वत की तलहटी पर रुके पानी में ग्लेशियर या चट्टान का गिरना या फिर फ्लैश फ्लड हो सकती है।

पूर्व वैज्ञानिक डॉ. डीपी डोभाल बताते हैं कि धराली फ्लड प्लेन में बसा है। धराली के पीछे डेढ़-दो किलोमीटर लंबा और बेहद घना जंगल है। जिस खीर गाड से फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) आया वो उन्हीं जंगलों से होकर गुजरता है। उसके ऊपर बर्फीला पर्वत है लेकिन जिस गति से फ्लैश फ्लड आया है वो बादल फटने जैसा नहीं है।

धराली और उसके अगल-बगल बेहद संकरी घाटी और ऊंचे पहाड़
बादल फटने पर आने वाला बहाव पहले धीमा फिर तेज होता है। जबकि धराली में इसकी गति ऊपर जंगल में किसी अस्थाई झील या पानी जमाव जैसी स्थिति को दर्शाता है। फिर बादल फटने का मतलब एक घंटे में 100 मिमी से ऊपर बारिश होना होता है। उन्होंने बताया कि धराली और उसके अगल-बगल बेहद संकरी घाटी और ऊंचे पहाड़ हैं।

ऐसे में कोई ग्लेशियर टूटकर अस्थाई झील या जमे हुए पानी पर गिरता है तो उसे तोड़ देता है, इसी वजह से जो पानी नीचे आया वह काले रंग का और मलबा स्लेटी रंग का है। ऐसा पानी और मलबा जमे हुए स्थान के टूटने से आता है। जैसा 2021 में चमोली जिले के ऋषिगंगा हादसे में अस्थाई झील में जमा मलबा बहकर नीचे आया था।
 

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बादलों में कितने लीटर होता है पानी? बादल फटने के बाद अचानक चारों तरफ मच जाती है तबाही - फोटो : Adobe Stock

वहीं 2013 में केदारनाथ आपदा के समय चोराबारी झील के टूटने से आए सैलाब की थी। उन्होंने कहा कि आमतौर पर 3-4 हजार मीटर की ऊंचाई पर बारिश नहीं होती, बर्फबारी होती है लेकिन पर्यावरण बदलाव और बढ़ते तापमान से ये पैटर्न बदल गया है। अब लगातार बारिश होगी तो उससे ग्लेशियर टूटेंगे, ये ग्लेशियर किसी अस्थाई झील पर गिरे तो झील टूटकर तेजी से नीचे की तरफ आएगी।

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प्रभावितों से मिले सीएम धामी - फोटो : सूचना

धराली की तबाही के वीडियो को देखें तो ऐसा लग रहा है कि सैलाब किसी चीज के अचानक टूटने से बहुत तेजी से नीचे आया। इसमें पानी के साथ लूज मटीरियल (बर्फ, पत्थर, रेत, बजरी) भी है जो खड़ी ढलान होने की वजह से ऊपर के सारे पदार्थ को नीचे ले आया।

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Uttarkashi Cloudburst Reason disaster in Dharali was not caused by cloudburst scientists Says Uttarakhand
सीएम ने किया प्रभावित क्षेत्र का दौरा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ मनीष मेहता का कहना है कि इस आपदा की वजह सेटेलाइट इमेज के आने पर ही समझी जा सकती है। हालांकि पूर्व के अनुभवों व अध्ययन से इसके तीन-चार कारण माने जा सकते हैं। जिसमें ग्लेशियर टूटना, भूस्खलन से बनी अस्थाई झील का टूटना, फ्लैश फ्लड हो सकते हैं।

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जवान रेस्क्यू में जुटे - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
जब तक सेटेलाइट तस्वीरें नहीं आती और वैज्ञानिकों का दल वहां का दौरा नहीं करता, इसकी ठोस वजह बताना मुश्किल है। हालांकि अब तक आपदा के किए गए अध्ययन से माना जा रहा है कि ग्लेशियर टूटना, भूस्खलन से बनी झील का टूटना, फ्लैश फ्लड इसकी वजह हो सकती है। - डॉ विनीत कुमार गहलोत, निदेशक वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान
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