पहाड़ की जिन वादियों में दुनिया सुकून तलाशने पहुंचती है वहां के बाशिंदों के लिए वही वादियां अब खौफ और बेबसी की वजह बन चुकी हैं। यह विरोधाभास ही है कि जो शांत फिजाएं पर्यटकों का मन लुभाती हैं वे वहां के निवासियों को खालीपन के अंधेरे और मानसिक बीमारियों के जाल में धकेल रही हैं।
पहाड़ के लोगों का मन टटोलने वाले मनोवैज्ञानिकों की मानें तो यहां रहने वाला लगभग हर व्यक्ति सामान्य अवसाद से जूझ रहा है। प्राकृतिक आपदा, बाघ के हमले, खाई में गिरते वाहन आदि घटनाएं तो लोगों के अवसाद का प्रत्यक्ष कारण बन ही रहीं हैं साथ ही न दिखने वाली विपरीत परिस्थितियां भी मानसिक रोग की वजह बन रहीं हैं।
वीरान पड़े घर
इसकी वजह से लोग सोमाटाइजेशन विकार, पीटीएसडी, सिजोफ्रेनिया, बाईपोलर डिसॉर्डर, साइकोसिस और डिमेंशिया की चपेट में आ रहे हैं। डर के साये में जी रहे इन इक्का-दुक्का लोगों के घरों में अब परिंदों की चहचहाहट ही बची है। वीरान पड़े घर की दहलीज पर बैठी वो बुजुर्ग आंखें किसी परिचित या अपरिचित को अपनी ओर आते देख चमक उठती हैं।
सच तो यह है कि पहाड़ का यह मौन अब सुकून नहीं बल्कि एक गहरी मानवीय त्रासदी का संकेत दे रहा है। स्वास्थ्य संवाददाता अंकित यादव ने गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली आदि पहाड़ी जिलों के दूरस्थ गांवों का दौरा किया। इस दौरान कई हैरतंगेज मामले सामने आए। पेश है विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट...
2 of 7
ग्रामीण
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आपदा में बेटा और घर दोनों गए, अब सिर्फ चिंता बची
उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में अगस्त 2025 में आई आपदा ने कामेश्वरी देवी की दुनिया उजाड़ दी। वह अपना दर्द बयां करते-करते रो पड़ीं। वह कहती हैं, आपदा ने मुझसे मेरा घर तो छीना ही मेरा बेटा भी हमेशा के लिए दूर कर दिया। अब मैं अपने जीजा के घर पर रहती हूं। घटना के बाद वह दृश्य कभी भी आंखों से ओझल नहीं हुआ। रात को किसी भी समय नींद टूट जाती है। मस्तिष्क में हमेशा तनाव रहता है। रक्तचाप बढ़ने-घटने की भी परेशानी है। इस तरह की मनोस्थिति को विशेषज्ञ पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर यानि (पीटीएसडी) का नाम दे रहे हैं। उस इलाके से पीटीएसडी के कई मरीज पहुंच रहे हैं।
3 of 7
घर में रह रहे बुजुर्ग
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
घरों के आसपास मलबे में दबे हैं शव, डर में गुजर रहा जीवन
धराली में आपदा के बाद 70 परिवार में से सिर्फ पांच-छह परिवार ही बचे हैं। आपदा में गांव के ही आठ लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा बड़ीसंख्या में वहां के होटलों में काम करने वालों और पर्यटकों की भी मौत हुई थी। गांव वालों का मानना है कई शव उनके घर के आसपास मौजूद मलबे में अब तक दबे हैं। ग्रामीण पूरणा देवी, परमानंद, शूरवीर समेत वहां रहने वाले सभी लोगों का दावा है कि उनके घरों के आसपास मलबे में कई शव दबे हैं। इससे उनके मन में हमेशा डर रहता है। मस्तिष्क में कई तरह के ख्याल आते हैं। इन परिस्थितियों पर उत्तरकाशी जिला अस्पताल की वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. प्रिया त्यागी बताती हैं कि उनके पास आने वाले हर 100 मरीजों में चार से पांच सिजोफ्रेनिया से जूझ रहे हैं। उनके मन में हमेशा अजीब आवाजें सुनाई देने और कुछ दिखाई देने का भ्रम रहता है।
4 of 7
खाली घर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बात करने के लिए सिर्फ दीवारें ही बचीं
टिहरी जिले के दूरस्थ उपलापांगर गांव की गोमती देवी वर्षों से अकेलेपन से जूझ रहीं हैं। बात करने के लिए उनके पास सिर्फ दीवारें ही हैं। वह जब भी किसी को अपने घर की ओर आते देखती हैं तो खुश हो जाती हैं। संवाददाता को देखकर वह दूर से ही खुशी से चिल्लाने लगीं। उनके जीवन में अब कोईभी नहीं है। उनके न तो हाथ काम करते हैं और न ही पैर। गांव के लोग ही खाना खिलाते हैं। टिहरी जिला अस्पताल के मनोवैज्ञानिक डॉ. नीरज कार्दमका कहना है कि यह स्थिति गंभीर डिप्रेशन और चिंता का कारण बनती है। ऐसे में पीड़ित गलत कदम उठाने या शरीर को नुकसान पहुंचाने से पहले विचार नहीं करता है।
5 of 7
ग्रामीण
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पड़ोसी छोड़कर चले गए, अब सिर्फ हम ही बचे हैं
पौड़ी जिले के तकल्लां गांव में दो लोगों का सिर्फ एक ही परिवार बचा है। इसमें विमला देवी और उनका बेटा शांति प्रसाद है। विमला बताती हैं कि पूरा गांव खाली है। चार बजे के बाद बाघ आंगन तक पहुंच जाते हैं। अकेलेपन की वजह से हमेशा घबराहट रहती है। यही स्थिति पौड़ी के सुराल और पाली गांव की भी है। रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के फलई गांव निवासी कुमारी शैली की भी यही हालत है। मां के गुजरने के बाद अकेलेपन ने उन्हें गंभीर मनोरोग की ओर ढकेल दिया है।