नियामक आयोग का अहम फैसला: गैस पावर कंपनी गामा को राहत, उपभोक्ताओं से वसूले जाएंगे 17.21 करोड़
वर्ष 2024-25 के ट्रू-अप, 2025-26 के वार्षिक प्रदर्शन और 2026-27 के वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) पर आए इस आदेश में आयोग ने दोनों पक्षों की लेटलतीफी और कार्यशैली पर कड़ी फटकार लगाई।
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काशीपुर स्थित 214 मेगावाट की गैस आधारित बिजली उत्पादन कंपनी गामा इंफ्रा के खर्चों में कटौती करते हुए नियामक आयोग ने कुछ राहत दी है। वर्ष 2024-25 के हिसाब में वार्षिक स्थिर प्रभार (एएफसी) पूर्व में ही मंजूर करने के बाद अब इसकी कैरिंग कॉस्ट सहित 16.37 करोड़ रुपये का घाटा और 84 लाख रुपये एनर्जी चार्ज मिलाकर कुल 17.21 करोड़ यूपीसीएल सात किस्तों में चुकाएगा।
वर्ष 2024-25 के ट्रू-अप, 2025-26 के वार्षिक प्रदर्शन और 2026-27 के वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) पर आए इस आदेश में आयोग ने दोनों पक्षों की लेटलतीफी और कार्यशैली पर कड़ी फटकार लगाई। आयोग के अध्यक्ष एमएल प्रसाद, सदस्य विधि अनुराग शर्मा और सदस्य तकनीकी प्रभात किशोर डिमरी की पीठ ने आदेश की शुरुआत में ही दोनों पक्षों को आड़े हाथों लिया। आयोग ने पाया कि यूपीसीएल बार-बार दस्तावेजों की लंबी फेहरिस्त मांगकर सुनवाई को टालता रहा और आयोग की अधिकार सीमा में दखल देकर खुद ही समानांतर जांच बैठाने लगा था। दूसरी ओर, गामा इन्फ्राप्रॉप ने भी जरूरी जानकारियां समय पर न देकर मामले को महीनों लटकाए रखा। आयोग ने दो टूक शब्दों में नसीहत दी कि नियामक प्रक्रिया समयबद्ध होती है। कंपनियां अपनी सुस्ती और फिजूल की आपत्तियों से उपभोक्ताओं पर अनिश्चितता का बोझ न डालें।
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एसी, नई कार और सीएसआर को आयोग ने माना बेकार
गामा इन्फ्राप्रॉप ने कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) मद में 50 लाख रुपये का खर्च बिजली खर्च में जोड़ने की मांग की थी। आयोग ने इसे खारिज करते हुए कहा कि सीएसआर कंपनी को अपने मुनाफे से करना होता है। इसका बोझ राज्य के बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर नहीं डाला जा सकता। इसी प्रकार, पावर प्लांट और कंट्रोल रूम के लिए 17 लाख रुपये के नए एसी खरीदे गए। जब आयोग ने पुराने एसी का हिसाब मांगा तो कंपनी संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। पुराने एसी कबाड़ की तरह पड़े मिले। आयोग ने इस 17 लाख के खर्चे को नामंजूर कर दिया। प्लांट के जीएम के लिए 30 लाख रुपये की नई खरीदी गई। पुरानी कार सामान्य कर्मचारियों को दे दी गई। यूपीसीएल ने इस पर आपत्ति जताई। आयोग ने चेतावनी देते हुए खर्च को 50-50 फीसदी में बांटकर यूपीसीएल से अनुबंधित क्षमता के तहत केवल 15 लाख की अनुमति दी और भविष्य में गाड़ियों की फिजूलखर्ची से बचने की सख्त हिदायत दी।
2.18 करोड़ का दिखाया कूलर
विवाद का एक बड़ा केंद्र प्लांट में लगा इवेपोरेटिव कूलिंग सिस्टम रहा। यूपीसीएल का तर्क था कि जब महंगी गैस के कारण प्लांट ज्यादातर समय बंद रहता है तो करोड़ों रुपये का कूलिंग सिस्टम लगाने की क्या जरूरत थी। गामा इन्फ्राप्रॉप ने दलील दी थी कि गर्मियों में जब तापमान 44 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है तो हवा का घनत्व घटने से गैस टरबाइन हांफने लगती है। चालू ही नहीं हो पाती। इस कूलिंग सिस्टम से हवा ठंडी होती है जिससे पीक सीजन में प्लांट का उत्पादन 11 से 15 प्रतिशत बढ़ जाता है। आयोग ने तकनीकी पहलुओं और विशेषज्ञ सलाह को सही मानते हुए 2.18 करोड़ रुपये के इस खर्च को हरी झंडी दे दी।
उपभोक्ताओं से सात किस्तों में होगी वसूली
आयोग ने वर्ष 2024-25 के हिसाब में वार्षिक स्थिर प्रभार (एएफसी) पूर्व में ही मंजूर करने के बाद अब इसकी कैरिंग कॉस्ट सहित 16.37 करोड़ रुपये का घाटा और 84 लाख रुपये एनर्जी चार्ज मिलाकर कुल 17.21 करोड़ रुपये यूपीसीएल चुकाएगा। यह कुल बकाया राशि यूपीसीएल सितंबर से सात समान मासिक किस्तों में उपभोक्ताओं से वसूल करेगा।