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कूड़ा बीनने वाले बच्चों के लिए मसीहा बनीं महिला पुलिस की ये जवान, पढ़ेंगे तो करेंगे सैल्यूट

Sun, 16 Dec 2018 05:11 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 16 Dec 2018 05:11 PM IST
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Uttarakhand police Women constable teaching poor and beggars childrens after duty
बच्चों को पढ़ातीं सविता

खाकी पहनने वालों में भावनाएं भी हैं, इंसानियत भी और नेकदिली भी। इसका जीता जागता उदाहरण हैं जनपद चम्पावत में तैनात महिला कांस्टेबल सविता कोहली। सविता समाज के लिए एक प्रेरणा है। उत्तराखंड पुलिस ने अपने फेसबुक पेज पर उनकी नेकदिली की कहानी शेयर की है। तो चलिए आप पर भी पढ़िए..

Uttarakhand police Women constable teaching poor and beggars childrens after duty
बच्चों को पढ़ातीं सविता

उत्तराखंड पुलिस के बनबसा थाने में तैनात ट्रैफिक कांस्टेबल सविता कोहली व्यस्त ड्यूटी पूरी करने के बावजूद हर रोज दो घंटे का समय कूड़ा बीनने वाले बच्चों को पढ़ाने में व्यतीत कर रही हैं। सविता ऐसे बच्चों की मां व शिक्षिका की भूमिका निभा रही हैं जिनके हाथों में किताबें नहीं बल्कि कूड़े के थैले हैं। 2017 में पुलिस सेवा में भर्ती हुई सविता के पति गोविंद राम कोहली भी पुलिस में हैं।

Uttarakhand police Women constable teaching poor and beggars childrens after duty
बच्चों को पढ़ातीं सविता

इनमें से कुछ मासूम सविता के ममत्व की छांव में बेहतर भविष्य की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। अधिकांश बच्चों के माता-पिता गरीब होने के साथ-साथ अशिक्षित भी हैं। कांस्टेबल सविता अपनी ड्यूटी के साथ-साथ ऐसे बच्चों को शिक्षित बनाने की व्यक्तिगत पहल में निस्वार्थ भाव व पूर्ण समर्पण से जुटी हैं। फिलहाल उनकी क्लास में इस समय 52 बच्चे शामिल हैं।

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Uttarakhand police Women constable teaching poor and beggars childrens after duty
बच्चों को पढ़ातीं सविता

बकौल सविता जब उनकी ड्यूटी बस स्टेंड के पास लगी थी, इस दौरान छह-सात साल की उम्र के दो बच्चों को उन्होंने कूड़ा बीनते देखा। उन्होंने बच्चों से पूछा कि वे स्कूल क्यों नहीं जाते हैं तो बच्चों के चेहरे पर खामोशी देख वो समझ गईं और कहा कि कल से मैं तुम्हें पढ़ाऊंगी। 

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Uttarakhand police Women constable teaching poor and beggars childrens after duty
बच्चों को पढ़ातीं सविता

अगले दिन सविता खुद टाट-चटाई, कॉपी, किताब, पेंसिल एवं अन्य स्टेशनरी खरीदकर मीना बाजार झोपड़-पट्टी इलाके में पहुंच गई। यहां बाहर से आकर मजदूरी कर गुजर बसर करने वाले गरीब लोगों के परिवार रहते हैं। गरीबी के साथ-साथ अशिक्षा की वजह से मां-बाप बच्चों को स्कूल नहीं भेज रहे थे। जबकि कुछ परिवार ऐसे थे, जो बच्चों के श्रम से ही घर खर्च चलाते थे। 

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