माउंट त्रिशूल पर एवलांच की चपेट में आए नौसेना के पर्वतारोहियों को निकालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। टीम के पास संसाधन सीमित थे। समय भी कम था। खराब मौसम लगातार दुश्वारियां बढ़ा रहा था। बावजूद इसके राहत-बचाव टीम ने घटना के मात्र 12 घंटे के भीतर दल के कुछ सदस्यों को ट्रेस कर लिया था। हालांकि मौसम बेहद खराब होने के कारण उन तक पहुंचने में समय लग गया।
माउंट त्रिशूल आरोहण के दौरान बर्फीले तूफान की चपेट में आए नौसेना के पर्वतारोहियों के दल के राहत-बचाव के लिए निम की तीन सदस्यीय टीम गई थी। टीम का नेतृत्व निम के प्रधानाचार्य कर्नल अमित बिष्ट ने किया। राहत-बचाव से लौटकर कर्नल बिष्ट ने अमर उजाला से अपने अनुभव साझा किए।
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उन्होंने बताया कि राहत-बचाव में हमारी लड़ाई समय के साथ थी, लेकिन खराब मौसम, पर्वतारोहियों के पास एवलांच विक्टिम डिटेक्टर न होना और राहत-बचाव हेलीकॉप्टर में सीमित संसाधनों ने राहत-बचाव अभियान को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया था।
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विंच ऑपरेशन के उपकरण भी नहीं थे
- फोटो : अमर उजाला
हेलीकॉप्टर में विंच ऑपरेशन के उपकरण भी नहीं थे, जिससे घटनास्थल पर टीम को उतारा नहीं जा सकता था। फिर भी टीम ने सभी चुनौतियों को पार करते हुए मात्र 12 घंटे में ही पर्वतारोहियों को ट्रेस कर लिया था।
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राहत-बचाव में लगी टीमें
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कर्नल बिष्ट ने बताया कि पर्वतारोहियों के पास एवलांच विक्टिम डिटेक्टर (एवीडी) नहीं थे, जिससे इनकी लोकेशन पता नहीं चल पा रही थी। यदि सभी पर्वतारोहियों के पास एवीडी होते तो इन्हें और जल्द सर्च कर लिया जाता।
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माउंट त्रिशूल फतह के लिए जाते जवान
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उत्तराखंड में पर्वतारोहण से जुड़ी बेहतर सुविधाएं होनी चाहिए। यहां पर्वतारोहण की बहुत गतिविधियां होती हैं। पूरे विश्व से यहां पर्वतारोही आते हैं, लेकिन ऐसी कोई घटना होने पर उत्तराखंड में राहत-बचाव के लिए कोई विशेष सुविधाएं नहीं हैं।
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चारों जवानों के पार्थिव शरीर नेवी हेडक्वार्टर भेजे
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राहत-बचाव के लिए एसडीआरएफ को भी विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। राहत-बचाव के लिए बेहतर उपकरणों वाले कम से कम दो-तीन हेलीकॉप्टर उपलब्ध होने चाहिए।