उत्तराखंड में साल 2007 से ऋषि गंगा जल विद्युत परियोजना निर्माण का कार्य शुरू हो गया था, लेकिन शुरुआत से ही परियोजना को प्राकृतिक आपदाओं ने घेर लिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश पुजारी ने बताया कि वर्ष 2008 में परियोजना पर अचानक चट्टानें गिरने से उसे काफी नुकसान उठाना पड़ा था। वर्ष 2010 में चट्टान खिसकने के कारण परियोजना में काम कर रहे तीन मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई थी।
गुस्से में पहाड़ : परियोजना के एक साल बाद ही प्रकृति ने किया था इशारा, नहीं समझे और अब चुका रहे कीमत
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जैसे-तैसे वर्ष 2011 में परियोजना से बिजली उत्पादन शुरू हुआ ही था कि परियोजना के मालिक राकेश मेहरा, निवासी-लुधियाना के सिर पर चट्टान गिर गई और वे अकाल मौत का शिकार हो गए थे। इस तरह की आपदाएं हिमालय में न हों इसके लिए हिमालय क्षेत्र में तत्काल टनलों के निर्माण पर रोक लगा देनी चाहिए।
इसे देखते हुए प्रसिद्ध पर्यावरणविद् व अखिल भारतीय ग्लेशियर स्टडी ग्रुप के मुख्य सदस्य पद्मविभूषित चंडी प्रसाद भट्ट ने परियोजना निर्माण से पहले ही इसका विरोध कर दिया था। इसके बाद भी परियोजना बन गई। वर्ष 2010 में चंडी प्रसाद भट्ट ने उच्च सत्ताक कमेटी उच्चतम न्यायालय के सदस्य जीवराजका को पत्र भेजकर क्षेत्र की संवेदनशीलता, जीव-जंतु, वन संपदा व पर्यावरणीय नुकसान को देखते हुए परियोजना को निरस्त करने की मांग उठाई थी, लेकिन इस ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया।
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चंडी प्रसाद भट्ट ने बताया कि ऋषि गंगा का उद्गम स्थल 18000 फीट की ऊंचाई पर त्रिशूली नाले से होकर आता है। परियोजना नंदा देवी बायोस्फियर रिजर्व के कोर जोन के समीप बनी थी। वर्ष 1974 में स्थानीय लोगों के चिपको आंदोलन चलाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने डा. वीरेंद्र कुमार की अध्यक्षता में रैणी चिपको आंदोलन कमेटी का गठन किया था, जिसमें शीर्षस्थ वन विज्ञानी, भूगर्भविद्, भूमि संरक्षण के विशेषज्ञ और जनप्रतिनिधियों को शामिल किया गया था।
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कमेटी की संस्तुति के आधार पर ऋषिगंगा से लेकर अलकनंदा घाटी के लगभग 1200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रों में कार्ययोजना के आधार पर होने वाले सभी वन कटानों को निरस्त कर दिया गया था। इसके बावजूद पर्यावरणीय पहलुओं की अनदेखी कर वर्ष 2007 में ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट का निर्माण हुआ।