योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित किताब ‘द मोंक हू बिकेम चीफ मिनिस्टर’ लिखने वाले शांतनु गुप्ता ने ‘वैली ऑफ वर्ड्स’ लिटरेचर फेस्टिवल में उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंग साझा किए। उन्होंने योगी के बचपन, कॉलेज के दिनों से लेकर महंत बनने और राजनीति में उतरने से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक के दिनों के किस्से किताब के माध्यम से लोगों के सामने रखे। राजपुर रोड स्थित एक होटल में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन कई सत्र संपन्न हुए। इस दौरान लेखक शांतनु गुप्ता ने बताया कि योगी बचपन (तब उनका नाम अजय बिष्ट था) से निर्भीक और साहसी थे।
जब वह कोटद्वार महाविद्यालय से बीएससी कर रहे थे तब उनकी सहपाठी छात्रा ने छात्रसंघ पदाधिकारी पद पर चुनाव लड़ा। योगी तीन सहपाठी छात्राओं और चार छात्रों के साथ चुनाव प्रचार करने कोटद्वार के पास एक क्षेत्र में गए थे। वहां से लौटने पर उन्हें रात हो गई। उस समय उस सड़क पर बेहद कम वाहन चलते थे। जो वाहन आ भी रहे थे, उन्होंने युवाओं को देखकर रोकना मुनासिब नहीं समझा। अंधेरा बढ़ने लगा तो योगी को साथी छात्राओं की चिंता सताने लगी।
डर से छात्राएं रोने लगीं। तभी उन्होंने देखा कि सामने से एक बस आ रही है। योगी तुरंत सड़क पर खड़े हो गए और तेज रफ्तार बस को रुकने का इशारा किया। चालक ने उन्हें डराने के लिए रफ्तार बढ़ा दी, लेकिन योगी सड़क पर डटे रहे। करीब पहुंचकर चालक ने ब्रेक मारे, उसके बाद योगी ने साथियों को बस में बैठाया। शांतनु गुप्ता ने बताया कि योगी सार्वजनिक रूप से बेहद उग्र और हाजिर जवाब माने जाते हैं, लेकिन वह उतने शर्मीले भी हैं। उन्होंने बताया कि जब वह योगी के पास उनकी जीवनी लिखने का प्रस्ताव लेकर गए तो वह शर्माते हुए बोले ‘क्या करोगे मुझ पर किताब लिखकर’।
शांतनु ने बताया कि घटनाओं का जिक्र करने पर योगी खुद बताने के बजाय, उससे जुड़े किसी अन्य व्यक्ति से पूछने को कह देते। कोटद्वार में पढ़ाई के दौरान योगी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य बने। उस समय कोटद्वार में परिषद की एक बड़ी बैठक आयोजित हुई। उसमें एक व्यक्ति की हैजा से मौत हो गई। उस समय हैजा महामारी के रूप में फैलता था। इसलिए लोग हैजा पीड़ित के पास जाने से भी बचते थे।
किसी ने भी उस व्यक्ति के शव के पास जाने की हिम्मत नहीं दिखाई। ऐसे में योगी आगे आए और शव परिजनों के घर छोड़ आए। छात्र जीवन में योगी ने एक बार वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई की भी सदस्यता ली। वह कोटद्वार में अपनी दीदी के घर रहकर पढ़ाई कर रहे थे। दीदी के देवर ने उन्हें एसएफआई की सदस्यता दिलाई।