नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने वर्ष 1938 में दर्शन महाविद्यालय में तीन महीने तक साधना की थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के दर्शन महाविद्यालय में साधना करने की सूचना के बाद टिहरी रियासत के तत्कालीन डिप्टी क्लेक्टर ने विद्यालय में छापा मारा था। लेकिन नेता जी उनके हाथ नहीं लगे थे। जाते समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस दर्शन महाविद्यालय के संस्थापक रघवाचार्य महाराज को घड़ी दान देकर चले गए थे।
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सुभाष चंद्र बोस
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दर्शन महाविद्यालय के अध्यक्ष बंशीधर पोखरियाल ने बताया कि टिहरी के राजा नरेंद्र शाह की ओर से दी गई भूमि पर एक विद्यालय स्थापित किया गया था। वर्ष 1919 में संस्कृत के विद्वान गोपीनाथ कविराज की ओर से शास्त्री की मान्यता दिलवाई गई। वर्ष 1938 में तीन महीने एक बंगाली साधक आए थे। वह योग और संस्कृति का अध्ययन करने के लिए कुटिया में अध्ययनरत थे।
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस
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मुनिकीरेती क्षेत्र तब टिहरी रियासत का हिस्सा था। उस दौरान एक दिन टिहरी रियासत के डिप्टी क्लक्टर अचानक विद्यालय में स्वामी राघवाचार्य से भेंट करने के लिए पहुंच गए। इस दौरान उन्होंने कुटिया में रह रहे साधकों को देखा और तुरंत वापस चले गए। अगले ही दिन वह दलबल के साथ विद्यालय में पहुंचे और सीधे साधक कुटिया की ओर निकल पड़े।
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एक घड़ी भी देकर गए सुभाषचंद्र बोस
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इस दौरान उन्होंने स्वामी राघवाचार्य से बंगाली साधक के बारे जानकारी हासिल की तो स्वामी ने बताया कि वह साधक रात को ही चले गए और जाते वक्त एक घड़ी भी देकर गए। रियायत के अधिकारियों ने स्वामी को बताया कि वह सुभाषचंद्र बोस थे, जिन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेेजी शासकों का आदेश मिला था।
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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का भावपूर्ण स्मरण किया गया
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1938 में अंग्रेज सरकार ने सुभाष चंद्र बोस को भारत आने की अनुमति दी थी। अधिकांश रजवाड़े अंग्रेजों का सहयोग करते थे। क्रांतिकारियों को कोई भी शरण देने के लिए डरता था। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयंती को भाजयुमो चम्पावत इकाई द्वारा पराक्रम दिवस के रूप में मनाते हुए उनका भावपूर्ण स्मरण किया गया। भाजयुमो नगर अध्यक्ष गौरव पांडेय की अध्यक्षता में गोष्ठी का आयोजन हुआ।