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भोले बाबा और गौरी माई के मिलन की ये कहानी है बेहद अद्भुत और रहस्यमयी

Sat, 10 Nov 2018 06:45 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुप्तकाशी (रुद्रप्रयाग)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुप्तकाशी (रुद्रप्रयाग) Updated Sat, 10 Nov 2018 06:45 PM IST
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story behind uttarakhand mysterious temple
gauri mayi temple - फोटो : अमर उजाला

भगवान केदारनाथ की डोली के गौरीकुंड पहुंचने से पहले शुक्रवार को गुप्तकाशी में मंदाकिनी नदी किनारे स्थित गौरी माई मंदिर के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार के साथ शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए।



 

केदारनाथ के कपाट खुलने से पहले गौरी माई के कपाट खुलने की परंपरा

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ganesha

पारंपरिक रीति रिवाज के साथ गौरी माई की डोली अपने शीतकालीन पड़ाव गौरी गांव पहुंच गई है। अब छह माह तक मां की पूजा-अर्चना यहीं चंडिका मंदिर में होगी। मान्यता है कि भगवान शिव ने पार्वती के अंग निर्मित गणेश से युद्ध करने के बाद उसका सिर काट दिया था, जिससे गौरी माई शिव से नाराज हो गई थीं।

मंदिर की एक परिक्रमा करने के बाद मां की डोली रवाना हुई

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kedarnath

इसलिए केदारनाथ की उत्सव डोली गौरीकुंड पहुंचने से पहले गौरी माई की डोली गर्भगृह से बाहर आकर अपने शीतकालीन गद्दीस्थल गौरी गांव के लिए रवाना होती है, ताकि भोले बाबा व गौरी माई का मिलन न हो सके। केदारनाथ के कपाट खुलने से पहले गौरी माई के कपाट खुलने की परंपरा है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव व पार्वती का मिलन होता है।

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gauri mayi temple

मंदिर के कपाट बंद होने से पहले सुबह पांच बजे गौरीकुंड मंदिर में मां गौरी की विशेष पूजा अर्चना शुरू हुई। भोग लगाने के बाद मंदिर के कपाट बंद करने की प्रक्रिया शुरू हुई। मां गौरी की भोगमूर्ति को कंडी में प्रतिष्ठापित किया गया। ठीक साढे़ आठ बजे वैदिक मंत्रोच्चारण एवं पौराणिक रीति रिवाज के साथ मां गौरी माई के कपाट भक्तों के दर्शनार्थ बंद कर दिए गए।

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doli - फोटो : amar ujala

मंदिर की एक परिक्रमा करने के बाद मां की डोली गौरी गांव के लिए रवाना हुई। इस मौके पर पुजारी लोकेश्वर प्रसाद, मठापति संपूर्णानंद गोस्वामी, प्रधान राकेश प्रसाद गोस्वामी, नरोत्तम प्रसाद, कुलानंद गोस्वामी, कैलाश बगवाड़ी आदि मौजूद थे।

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